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अक्षय-तृतीया:इस तिथि पर किए गए दान व हवन का क्षय नहीं होता

अक्षय-तृतीया:इस तिथि पर किए गए दान व हवन का क्षय नहीं होता

अस्यां तिथौ क्षयमुर्पति हुतं न दत्तं ।
तेनाक्षयेति कथिता मुनिभिस्तृतीया ।
उद्दिश्य दैवतपितृन्क्रियते मनुष्यैः ।
तत् च अक्षयं भवति भारत सर्वमेव ।। – मदनरत्न

अर्थ : (श्रीकृष्ण कहते हैं) हे युधिष्ठिर, इस तिथि पर किए गए दान व हवन का क्षय नहीं होता; इसलिए मुनियों ने इसे ‘अक्षय तृतीया’ कहा है । देवता व पितरों को उद्देशित कर इस तिथि पर जो कर्म किए जाते हैं, वे सर्व अक्षय (अविनाशी) होते हैं । इस वर्ष अक्षय तृतीया 21 अप्रैल, 2015 को है ।

निरंतर सुख व समृाqद्ध प्रदान करने वाले देवता के प्रति अक्षय तृतीया पर कृतज्ञता का भाव रखकर की गई उपासना के कारण हम पर होने वाली उस देवता की कृपादृाqष्ट का कभी क्षय नहीं होता ।
त्रेतायुग जिस दिन आरंभ हुआ, वह दिन है अक्षय तृतीया । जिस दिन एक युग का अंत होकर दूसरे युग का आरंभ होता है, उस दिन का हिंदु धर्मशास्त्र में अनन्य साधारण महत्त्व होता है । इस दिन से एक कलह काल का अंत व दूसरे युगके सत्ययुगका आरंभ, ऐसा अवसर साधने के कारण इस पूरे दिन को ‘मुहूर्त’ कहते हैं । मुहूर्त यद्यपि केवल एक क्षण द्वारा ही साधा जाता है; परंतु संधिकाल के कारण उसका परिणाम 24 घंटों तक कार्यरत होने से उस संपूर्ण दिन को शुभ माना जाता है । इसीलिए ‘अक्षय तृतीया’ को ‘साढेतीन मुहुर्तोंमेंसे एक मुहुर्त’ माना जाता है । अक्षय तृतीया की तिथि पर ही हयग्रीव अवतार, नरनारायण प्रकटीकरण व परशुराम अवतार हुए । इससे ‘अक्षय तृतीया’तिथिका महत्त्व ध्यानमें आता है ।

तिल तर्पणका अर्थ व भावार्थ

तिल तर्पण अर्थात देवता व पूर्वजोंको तिल व जल अर्पण करना । तिल सात्त्विकता का प्रतीक है एवं जल शुद्ध भाव का प्रतीक है । तिल तर्पण करने का अर्थ है देवता को तिल के रूप में कृतज्ञता का व शरणागति का भाव अर्पण करना ईश्वरके पास सबकुछ है । अत: उन्हें क्या अर्पण कर सकते हैं ? उसी प्रकार यह अहं भी नहीं होना चाहिए कि, ‘मैं ईश्वर को कुछ अर्पण करता हूं’ इस हेतु तिल अर्पण करते समय ऐसा भाव रखें कि, ‘ईश्वर ही मुझ से सबकुछ करवा रहे हैं ।’ ऐसा करने से तिल तर्पण करते समय साधक का अहं न बढकर, उसका भाव बढता है । तिल तर्पण करना अर्थात देवता को तिल के रूप में कृतज्ञता का व शरणागति का भाव अर्पण करना ।

देवता को तिल तर्पण वैâसे करें ?

पद्धति : प्रथम देवताओं का आवाहन करें । तांबे की अथवा किसी भी अन्य सात्त्विक धातु की थाली अथवा पात्र हाथों में लें । ब्रह्मा अथवा श्री विष्णु का अथवा उनके एकत्रित रूप का अर्थात दत्त का स्मरण कर उन्हें पात्र में पधारने का आवाहन करें । तदुपरांत ‘देवता सूक्ष्म से वहां पधारे हैं, ऐसा भाव रखें । तिल में श्रीविष्णु व ब्रह्मा के तत्त्व पधारे हैं’, ऐसा भाव रखकर तिल हाथों में लें । तदुपरांत ऐसा भाव रखें कि, ‘उनके चरणों पर तिल अर्पण कर रहे हैं ।’

पूर्वजों को तिल तर्पण वैâसे करें ?

अक्षय तृतीया पर उच्च लोकों से सात्त्विकता आती है । उस सात्त्विकता को ग्रहण करने के लिए भुवलोक के अनेक जीव इस दिन पृथ्वी के निकट आते हैं । भुवलोक के बहुतांश जीव मानव के पूर्वज होते हैं । पूर्वज पृथ्वी के निकट आने से अक्षय तृतीया पर मानव को अधिक कष्ट होने की संभावना होती है । मानव पर पूर्वजों का ऋण भी भारी मात्रा में है । ईश्वर को अपेक्षित है कि, मानव इसे चुकाने के लिए प्रयत्न करे । इस हेतु अक्षय तृतीया पर पूर्वजों को तिल तर्पण करने की आवश्यकता होती है ।

पद्धति : दूसरी थाली में पूर्वजों को आवाहन करें । पूर्वजों को तिल अर्पण करने के पूर्व तिल में श्रीविष्णु व ब्रह्मा के तत्त्व पधारने हेतु देवताओं से प्रार्थना करें । तदुपरांत ‘पूर्वज सूक्ष्म से वहां पधारे हैं व हम उनके चरणों पर तिल व जल अर्पण कर रहे हैं’, ऐसा भाव रखें । तदुपरांत दो मिनटों के उपरांत देवताओं के तत्त्वों से भारित हुए तिल व अक्षत पूर्वजों को अर्पण करें । सात्त्विक बने तिल हाथों में लेकर उन पर धीरे से पात्र में जल छोडें । तदुपरांत दत्त अथवा ब्रह्मा अथवा श्रीविष्णु से प्रार्थना करें कि, वे पूर्वजों को गति प्रदान करें ।

अक्षय तृतीया पर सात्त्विकता के प्रक्षेपण के कारण अच्छा अनुभव होने का औसतन प्रमाण 60 से 70 प्रतिशत होता है, जबकि पूर्वजों का कष्ट होने का प्रमाण 30 से 40 प्रतिशत होता है । परिणामस्वरूप अक्षय तृतीया पर देवता व पूर्वजों को किए तिलतर्पण के कारण साधक पर बकाया देवऋण व पितरऋण कुछ प्रमाण में कम होने में सहायता होती है । साधक यदि प्रामाणिकता से, पूर्ण मन से व भावपूर्ण रूप से तिलतर्पण करता है, तो देवता व पूर्वज उस पर प्रसन्न होते हैं एवं उसकी साधना अच्छी होने हेतु व व्यवहार में आनेवाली अडचनें दूर होने हेतु आशीर्वाद देते हैं ।

त्यौहार मनानेकी पद्धति

स्नान दानादि धर्मकृत्य : कालविभाग का कोई भी प्रारंभदिन भारतीयों को सदैव पवित्र प्रतीत होता है । इसीलिए ऐसी तिथि पर स्नान, दान इत्यादि धर्मकृत्य बताए गए हैं । इस दिन की विधि इस प्रकार है – पवित्र जल से स्नान, विष्णु की पूजा, जप, होम, दान व पितृ तर्पण । ऐसा कहा गया है, कि इस दिन अपिंडक श्राद्ध करना चाहिए तथा यह संभव न हो, तो कम से कम तिल तर्पण करें । इस दिन धूप से सुरक्षा करनेवाली वस्तुएं जैसे छतरी, जूते इत्यादि भी दान करने चाहिए ।

हल्दी-कुमकुम : स्त्रियों के लिए यह दिन महत्त्वपूर्ण होता है । चैत्र मास में स्थापित चैत्र गौरी का इस दिन विसर्जन करना होता है । इस निमित्त वे हल्दी -कुमकुम (एक प्रथा) भी करती हैं ।’

इन कृत्योंके विषयमें कोई प्रश्न अथवा शंका हो, तो अवश्य पूछिए ।

स्थानीय संपर्वâ क्र. : सुरेश मुंजाल, 09811414247
संगणकीय पत्र (ई-मेल) : granth@sanatan.org

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