December 3, 2022

अर्थ चिंतन हेतु आत्म मंथन

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपनी बर्मा, ऑस्ट्रेलिया व फिजी की विदेश यात्राओं में एक बार फिर झंडे गाड़ दिये हैं। लीक से हटकर कूटनीतिक पहल व अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर पारदर्शिता, कर सुधार, मादक पदार्थों की तस्करी एवं कालेधन पर प्रतिबंध की उनकी बातें निश्चित रूप से प्रभावशाली हैं। देश में आंतरिक राजनीति में भी उनकी रणनीति बहुत ही आक्रामक व अपराजय वाली बनती जा रही है। झारखंड, जम्मू एवं कश्मीर तथा दिल्ली के प्रस्तावित विधानसभा चुनावों में भी भाजपा का सबसे बड़े दल के रूप में उभरना तय माना जा रहा है। कोई बड़ी बात नहीं यदि तीनों ही राज्यों में भाजपा की सरकारें बन जाये। मोदी सामाजिक परिवर्तनों के बड़े पुरोधा के रूप में भी उभर कर आये हैं। जहां एक ओर वह स्वच्छता अभियान के तहत सफाई और शौचालय पर जोर दे रहे हैं वहीं हर सामाजिक कुरीति के विरूद्ध आवाज उठा रहे हैं। यहां तक कि देश में बढ़ती नशाखोरी के विरूद्ध भी उन्होंने जंग लडऩे की ठान ली है, जो अकल्पनीय है। वे देश की शिक्षा व्यवस्था, पुराने कानूनों, प्रशासनिक सुधार, पारदर्शिता, शिक्षा-स्वास्थ्य नीतियों में भी बड़े फेरबदल कर रहे हैं। किन्तु एक मोर्चा जो कि मोदी की प्राथमिकता भी है, वह धार नहीं पकड़ पा रहा है और वह है हमारी अर्थव्यवस्था।
यूपीए सरकार के शासन के समय देश व्यापक वित्तीय अराजकता, लूट व भ्रष्टाचार के कारण रसातल में चला गया था। 20 करोड़ देशवासी मध्यम वर्ग से निम्न वर्ग में चले गये और 20 करोड़ से अधिक नयी पीढ़ी बेरोजगार पड़ी है। मोदी के लाख वादों के बाद भी देश की कमर तोडऩे वाले नेताओं, नौकरशाही, उद्योगपतियों, व्यापारियों व दलालों के विरूद्ध सरकार किसी भी प्रकार की कोई कार्यवाही ही नहीं कर रही है। उच्चतम न्यायालय ही थोड़ा बहुत इस मुद्दे पर सक्रिय है। सरकार तो इसके उलट इन भ्रष्ट लोगों का बचाव ही करती नजर आ रही है। बल्कि सरकार की नयी अर्थ नीति के इंजन व ड्राइवर ये संदिग्ध लोग ही हैं। मोदी बातों में चाहे जितना जिक्र आम आदमी, किसान व गरीब का कर लें लेकिन उनकी अन्तर्निहित भावना उन लोगों को बाजार का अंग बनाने की ही है। वे एक ओर बड़े उद्योगों की भारी ऋणों को न चुका पाने की स्थिति को अनदेखा कर रहे हैं वहीं उन्हें बड़ी कर छूट भी दे रहे हैं और नये निवेश के लिए आमंत्रण व सुविधायें भी। किन्तु आम भारतीय जो छोटे उद्योग चला रहा है, औसत दर्जे का व्यापारी है या फिर किसान मजदूर है, उसके लिए की जा रही घोषणाएं बहुत थोड़ी व दिखावटी हैं। इसकी बानगी कुछ इस प्रकार है।
* जनधन योजना के तहत खुले नये बैंक अकांउटों में 80 प्रतिशत से अधिक पुराने लोगों द्वारा दोबारा खुलवाये गये खाते ही हैं या फिर एक व्यक्तिद्वारा कई कई खाते खुलवाये गए हैं।
* श्रमेव जयते योजना मात्र संगठित क्षेत्र के मजदूरों व कामगारों के लिए है। असंगठित क्षेत्र के मजदूर जो कुल मजदूरों का 80 प्रतिशत से अधिक है, वे इसके फायदों से वंचित है।
* देश के कृषि ऋणों का 94 प्रतिशत कृषि पर आधारित उद्योग ले जाते हैं और किसान ठगा रह जाता है।
* सरकार, किसान आयोग की सिफारिशों व भाजपा के घोषणा पत्र के वादे के विरूद्ध कृषकों को मिलने वाले समर्थन मूल्य को लागत का 50 प्रतिशत लाभ के साथ देने के वादे पर अमल लाने में विफल रही है जिससे कृषकों में भारी असंतोष है। उनके पूर्व के भुगतान भी लंबे समय से लंबित हैं।
द्य सरकार सूक्ष्म, लघु व मध्यम वर्ग के उद्योगों के विकास के लिए ठोस योजनाओं का ढांचा प्रस्तुत नहीं कर पा रही है जिससे इन उद्योगों को खासी निराशा है यद्यपि देश में अधिक रोजगार पैदा करने का ये उद्योग ही माध्यम है।
* सरकार ‘स्किल डेवलपमेंटÓ पर बहुत जोर दे रही है किन्तु उसकी नीति अभी तक सामने आयी ही नहीं है। पिछले अनुभवों के आधार पर यह दावे से कहा जा सकता है कि 90 प्रतिशत भारतीयों को इस योजना में कोई रूचि ही नहीं है और इसके प्रशिक्षण से जुड़ी संस्थाएं मात्र ‘मोटा माल कमाने के लिए ही इससे जुडऩा चाहती है। ऐसे में सरकार को एक बड़े घोटाले के लिए तैयार रहना चाहिए।
* सरकार शिक्षा व स्वास्थ्य का भारतीयकरण तो कर रही है, किन्तु इसके विविध स्तरों का एकीकरण कर इसे निम्न दर पर सबको समान रूप से सुलभ कराने की कोई योजना नहीं दिखाई दे रही है।
* सरकार के साथ काम करने वाले हजारों स्वयंसेवी संगठनों के अनुदान को, ठेकेदारों के भुगतान को व सरकारी खरीद को सरकार ने अटका रखा है, वहीं सरकारी बजट का इस वित्तीय वर्ष के आठ माह बीत जाने के बाद भी मात्र 25-30 प्रतिशत खर्च होने से बाजार में पैसा नहीं जा रहा है। ऐसे में जहां सरकारी सहायता पर टिके लाभार्थी निराश हैं वहीं बाजार में मांग घट रही है।
* मोदी विश्व भर में ‘मेक इन इंडियाÓ का नारा लगा निवेश को आकर्षित करने की कोशिश कर रहे हैं किन्तु बैंको, सार्वजनिक उपक्रमों, सरकार व निजी क्षेत्र के बड़े उद्यमियों के खातों में पड़े 25 से 30 लाख करोड़ रूपयों के खर्च की कोई प्रभावी रणनीति अभी तक नहीं बना पाए हैं। जिस कारण देश का विकास आगे नहीं बढ़ रहा है।
* अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में पेट्रोलियम पदार्थों के दामों में 40 प्रतिशत तक की कमी आने के बाद भी जनता को मात्र 15 प्रतिशत तक दामों में राहत मिल पायी है और आंकड़ों में दिखने के बाद भी बाजार में महंगाई में खास कमी नहीं दिखाई दे रही है, यह खासी निराशा पैदा करता है।
* देश में उत्पन्न होने वाले काले धन व विदेशों से आने वाले काले धन पर भी मोदी सरकार कोई रोक नहीं लगा पायी है, सब कुछ पहले जैसा ही चल रहा है। देश के आर्थिक विकास के आंकड़ों में सुस्ती के बाद भी फल-फूल रहे शेयर बाजार और उसमें आ रही कालेधन की आवक से सभी परिचित हैं। देश में सोने व हीरों के रूप में भी कालाधन बाहर से आ रहा है।
कुल मिलाकर नयी आर्थिक मंदी की आहट के बीच मोदी की नीतियां भारतीय अर्थव्यवस्था को बड़े उद्योगपतियों व व्यापारियों पर निर्भर करने की है और वे उनसे ये उम्मीद करते हैं कि यह वर्ग अगले कुछ वर्षों में 90 करोड़ विपन्न भारतीयों का उद्धार कर देगा। क्या यह संभव है? इसीलिए मोदी सरकार इस वर्ग के लिए फेसिलेटर की भूमिका में है। कुल मिलाकर वे पूंजीवादी अर्थव्यवस्था का मात्र ‘भारतीयकरण कर रहे हैं और समस्याओं के वास्तविक निदान से भाग रहे हैं। अगर वे सच में सबका साथ और सबका विकास चाहते हंै तो उन्हें अपनी अर्थनीतियों पर गहन आत्मचिंतन करना जरूरी है।

ANUJ AGRAWAL

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