November 29, 2022

किसी भी महिला को 24 सप्ताह तक बिना किसी मंजूरी के गर्भपात कराने का अधिकार : सुप्रीम कोर्ट

देश की सर्वोच्च अदालत ने अपने शरीर पर महिलाओं के अधिकार को फिर एक बार पुष्ट किया, तो यह स्वागतयोग्य होने के साथ ही आगे के फैसलों के लिए अनुकरणीय भी है। न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ ने साफ फैसला सुनाया है कि किसी भी महिला, विवाहित या अविवाहित, को 24 सप्ताह तक बिना किसी मंजूरी के गर्भपात कराने का अधिकार है। इसके साथ ही अदालत ने यह भी स्पष्ट किया है कि किसी विवाहित महिला को जबरन गर्भवती करना ‘मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेगनेंसी ऐक्ट’ के तहत बलात्कार माना जा सकता है।

गुरुवार को आए इस फैसले से महिला सशक्तीकरण को बहुत बल मिलेगा। मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेगनेंसी ऐक्ट के तहत गर्भपात के नियम स्पष्ट रूप से वर्णित हैं, उन्हीं के अनुरूप सर्वोच्च अदालत ने फैसला सुनाया है।

यह दुखद तथ्य है कि देश में अभी भी महिलाओं से जुड़े ज्यादातर फैसले पुरुष ही करते हैं। महिलाओं को अपने शरीर से जुड़े मुद्दों पर भी पुरुषों की मंजूरी लेनी पड़ती है, जबकि सर्वोच्च न्यायालय पहले ही महिलाओं के इस अधिकार पर रोशनी डाल चुका है।

असल में, भारत जैसे सामाजिक रूप से जटिल पुरुषवादी देश में न्यायालयों को ऐसे फैसले बार-बार दोहराने या परिभाषित करने पड़ते हैं। ध्यान रहे, इस अधिकार तक पहुंचने में महिलाओं को लंबा समय लगा है। अपने इस अधिकार के प्रति सभी महिलाओं को जागरूक रहना चाहिए। पुरुषों को भी यह पता होना चाहिए कि उनका अधिकार क्षेत्र कहां खत्म हो जाता है। ऐसे फैसलों से प्रेरणा मिलनी चाहिए और महिलाओं के साथ किसी भी तरह की ज्यादती का अंत होना चाहिए।

न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने यह भी कहा है कि विवाहित महिलाएं भी बलात्कार पीड़ित हो सकती हैं। बलात्कार का अर्थ है, बिना सहमति के संबंध बनाना। अगर ऐसा होता है, तो वैवाहिक रिश्ते में भी इसे दुष्कर्म ही माना जाएगा। महिला की सहमति सबसे जरूरी है। मौजूदा नियमों के अनुसार, तलाकशुदा, विधवा महिलाएं 20 सप्ताह के बाद गर्भपात नहीं करा सकतीं, लेकिन अन्य सभी महिलाओं के लिए 24 सप्ताह तक गर्भपात की अनुमति का प्रावधान है।

अदालत का यह फैसला 25 साल की गर्भवती अकेली युवती की अर्जी पर आया है। इस युवती को उच्च न्यायालय से राहत नहीं मिली थी, लेकिन सवार्ेच्च न्यायालय में न्याय के साथ ही नियमों को नई व्याख्या भी मिली है। शीर्ष अदालत ने साफ कर दिया कि किसी महिला से यह अधिकार छीनना उसकी गरिमा को कुचलने जैसा काम है।

गर्भपात और महिलाओं के अधिकार के मामले में भारत सामान्य रूप से दुनिया में बहुत आगे है। अनेक देश अभी भी गर्भपात को मंजूरी नहीं देते हैं। गर्भपात को मंजूरी देने वाले देशों की संख्या 100 भी नहीं है। लीबिया, इंडोनेशिया, नाइजीरिया, ईरान और वेनेजुएला सहित लगभग 50 देश तब गर्भपात की अनुमति देते हैं, यदि किसी महिला का स्वास्थ्य जोखिम में हो। कई अन्य देश बलात्कार, अनाचार या भ्रूण असामान्यता की स्थिति में ही गर्भपात को मंजूरी देते हैं।

अमेरिका में भी गर्भपात के अधिकार को लेकर विवाद चलता रहता है और वहां राज्यों के कानून अलग-अलग हैं। इस मोर्चे पर भारत के कानून काफी पुख्ता हैं, लेकिन यहां समाज में लोगों की सोच बदलने में समय लग रहा है। महिलाओं की सुरक्षा का दायरा बढ़ना चाहिए और यह तभी बढ़ेगा, जब उन्हें वास्तविक रूप से अधिकार दिए जाएंगे।

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