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कोरोना लॉकडाउन – निराशा से आशा की ओर !

कोरोना लॉकडाउन – निराशा से आशा की ओर !

‘आपकी अनुपस्थिति में कॉलेज बंद नहीं हो जाएगा | कर्तव्यनिष्ठा और अतिकर्मठता की जिद्द आपके प्राण अवश्य हर लेगी | दायित्वों के प्रति आत्मानुशासित आचरण के लिए पंख-पखेरू उड़ने के उपरांत कॉलेज में आपकी प्रतिमा का अनावरण अवश्य होगा” | परिजनों एवं स्नेहिल सहकर्मियों द्वारा कहे जाने वाले इन हास्य मिश्रित कटाक्षों को मैंने कभी गंभीरता से नहीं लिया अपितु हँसकर टाल दिया | इसका कारण स्पष्ट है कि नौकरी करना निजी एवं पारिवारिक आवश्यकता नहीं अपितु यह मेरा जुनून (जोश/लगन) है | शिक्षा एवं अनुभव से अर्जित ज्ञान को भावी पीढ़ी के साथ बांटने का जुनून, सामाजिक यशोप्राप्ति द्वारा परिवार के ॠण से उॠण होने का जोश और कबीरदास जी के इस दोहे को चरितार्थ करने की लगन “गुरू गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागूं पांय । बलिहारी गुरू आपने गोविन्द दियो बताय”|| है |

यह हम सब जानते हैं कि एक ओर जहां विश्व नववर्ष 2020 का स्वागत करने को आतुर था वही दूसरी ओर चीन चुपचाप कोरोना वाइरस से संघर्ष कर था | चीन के वुहान में जन्म लेने वाले इस नवजात वाइरस के समाचार तत्काल संसार के राष्ट्रों को नहीं मिलें, यह कहना अंतर्राष्ट्रीय मीडिया की नीयत पर संदेह और उसकी तत्परता एवं सजगता पर प्रश्नचिन्ह लगाना होगा | उस समय विश्व के छोटे-बड़े, विकसित-विकासशील एवं चीन से मित्रता और शत्रुता रखने वाले तमाम राष्ट्रों के लिए यह खबर ‘एक कान से सुनकर दूसरे से निकालने’ जैसी थी | इसका एक कारण यह भी था कि चीन ने कोरोना वाइरस से फैली बीमारी की गंभीरता पर पर्दा डाला, रहस्यमय व्यवहार किया, विश्व समुदाय को अँधेरे में रखा तथा कुटिल कूटनीति का परिचय दिया | ऐसे समय में तथाकथित शिक्षित बुद्धिजीवी वर्ग को अवश्य चीन में फैले कोरोना वाइरस पर आलोचनात्मक चर्चा और विश्लेषणात्मक मंत्रणा करने का मुद्दा मिल गया |

मनुष्य की प्रकृति विचित्र है, “जाके पाँव न फटी बिवाई, वो क्या जाने पीर पराई” अर्थात जब तक स्वयं को पीड़ा नहीं होती तब तक दूसरे के दर्द का अहसास भी नही होता । अन्य राष्ट्रों की भांति भारतीयों ने भी जनवरी में कोरोना संकट के खतरे कि आहट को सुना, फरवरी में उसके बारे में सोचा और मार्च में जब उसे अपने द्वार पर खड़े पाया तब सरकार ने हाथ-पैर (सामाजिक दूरी, जनता कर्फ़्यू और फिर 21 दिन का सम्पूर्ण लॉकडाउन) मारने शुरू किए | केंद्र एवं राज्य सरकारों द्वारा 13 मार्च से लेकर अब तक निरंतर आवश्यक कदम युद्ध स्तर पर इस विभीषिका से लड़ने एवं महामारी से बचने के लिए उठाए जा रहे है | विडम्बना यह है कि अभी भी पाखंडी धर्मांध तबलीगी जमात से जुड़े जाहिलों के कान पर जूं नहीं रेंग रही है |

लॉकडाउन में आप कैसा महसूस कर रही हैं ? शारीरिक अस्वस्थता में भी आप घर पर नहीं रुकी, आपके लिए यह लॉकडाउन किसी सजा से कम नहीं होगा ? लॉकडाउन – हमें कोरोना वाइरस से तो बचा लेगा, लेकिन कामकाजी लोग यदि इतने लंबे समय तक घरों में बंद रहेंगे तो मानसिक अवसाद की स्थिति में अवश्य पहुँच जायेंगे | मित्रों से मिले बिना, घर पर बंद रहना ‘जल बिन मछली’ जैसा है | इस प्रकार के प्रश्न, वक्तव्य और सोच वर्तमान परिस्थितियों में अधिकांश लोगों के मन-मस्तिष्क में प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से उत्तर और सुझाव की प्रतीक्षा में खड़े हैं |

स्नेही-पाठकों ! प्रत्येक मनुष्य में कुछ जन्मजात प्रवृतियाँ होती है | बुद्धि और रुचि के साथ साथ रचनात्मक क्षमता एवं सृजन की कला प्राणियों में श्रेष्ठ मनुष्यों को जन्म से ही प्राप्त है, उन्हे सामाजिक प्राणी कहा जाता है | सामाजिक प्राणी अर्थात समाज का सदस्य और समाज क्या है ? महान दर्शनिकों, विचारकों, शिक्षाविदों, बुद्धिजीवियों और समाजशास्त्रियों के द्वारा दी गई समाज की परिभाषाओं का निष्कर्ष है – ‘दो या दो से अधिक व्यक्तियों का समूह, जो दुख-सुख, गरीबी-अमीरी, हार-जीत और विपदा की घड़ी में एक साथ मिलकर रहें, सामाजिक इकाई है’ | दुर्भाग्यवश हम भारतीयों ने हमारी संस्कृति की रीढ़ की हड्डी सनातन मूल्यों के स्थान पर समृद्धि का पर्याय, भौतिक संसाधनों को समझ लिया | घरेलू नौकरानी, बच्चे की आया और ड्राईवर तथाकथित कामकाजी शिक्षित सभ्य समाज के युवाओं की कालांतर में अनिवार्य आवश्यकता बन गई है | माता-पिता के साथ तथा उनकी उपस्थिति से हमारी निजी स्वतन्त्रता का हनन होता है, लेकिन मित्रों एवं सहयोगियों से व्यक्तिगत समस्याओं तथा सामाजिक स्तर पर अमान्य सम्बन्धों की चर्चा करने में संकोच नहीं होता | माता-पिता, भाई-बहन और जीवन-साथी के समक्ष निजी-इच्छा, समस्या और कमजोरियों को बताने एवं स्वीकार करने में आत्म-अभिमान एवं अहंकार बाधक हो जाते है, क्योंकि गैरों से नहीं हमें अपनों से निजता (प्राइवेसी) चाहिए |

नौकरीपेशा दंपत्ति सदैव दबाव में रहते है, जैसे – बॉस को खुश रखने का दबाव, लक्ष्यों की निरंतर प्राप्ति का दबाव, सहयोगियों के साथ प्रतिस्पर्धा का दबाव, अदृश्य अनहोनी की आशंकाओं का दबाव, परिवार के साथ सामंजस्य स्थापित करने का दबाव और न जाने कितने प्रकार के दबावों एवं तनावों को दिन-प्रतिदिन जीते और झेलते है | संभवतया यही कारण है कि, युवाओं के पास घर के बुजुर्गों, अभिभावकों और रक्त-संबंधों से मिलने-जुलने तथा अपने ही बच्चों की देखरेख, उनकी शिक्षा-दीक्षा, उनके मनोरंजन और उनमें सनातन मानवीय सांस्कृतिक मूल्यों के बीजारोपण करने का समय ही नहीं है | वैसे यदि मजबूरी अथवा आवश्यकता के चलते किसी के अभिभावक साथ में रहते है, उस स्थिति में उनके सहयोग के लिए कामवाली बाई, बच्चों के पालन-पोषण के लिए आया और पढ़ाई के लिए गृह शिक्षक-शिक्षिकाओं की व्यवस्था करने में हमारी युवापीढ़ी संकोच नहीं करती है | आख़िर सारी भागदौड़ परिवार और परिजनों के लिए ही तो कर रहे हैं | आज के इस भौतिक युग और भागदौड़ की जिंदगी में जन्मजात प्रवृतियों एवं स्व-रुचि-अभिरुचियों को पूरा करने की कल्पना करना तरुण-युवा-प्रौढ़ पीढ़ी को निरर्थक लगता है |

गाँव-कस्बों, शहरों एवं महानगरों में तरुण-युवा-प्रौढ़ पीढ़ी फेसबुक, व्हाट्सप, इंस्टाग्राम, वाइबर, स्नेपचैट, ट्विटर और ऐसी ही अनेकों तकनीकी सोशल-साइड्स पर मित्र बनाने, विडियों बनाने, चैटिंग करने, फोटो और स्टेट्स पोस्ट करने को आधुनिकता समझती है | ऐसे तरुण-युवा-प्रौढ़ लोगों के लिए घर-परिवार के साथ बैठकर हँसी-मज़ाक, गपशप, विचार-विमर्श और पारिवारिक विषयों पर चर्चा करना, कौशल आधारित रुचिकर चटपटे व्यंजनों को बनाना और परिवार के साथ खाना, सिलाई-कढ़ाई-बुनाई, घर की साफ-सफाई और गृहसज्जा को बेमानी और अप्रासंगिक माना जाने लगा हैं | शहरी तरुण-युवा-प्रौढ़ पीढ़ी के अनुसार गाँव-कस्बों में रहने वाली अशिक्षित (शैक्षिक उपाधि विहीन) लड़कियों और महिलाओं के पास करने के लिए कुछ और नहीं होता, इसलिए उनके द्वारा ऐसे घरेलू कार्यों में समय बिताया जाता है, यह सब समय की बर्बादी है | यही हमारे ‘शहरी साक्षर शिक्षित कामकाजी युवाओं’ की सोच है | आज हम पाश्चात्य संस्कृति के प्रति इस हद तक सम्मोहित और उन्मुख हो गए है कि, भारतीय संस्कार, सभ्यता और संस्कृति को हेयदृष्टि से देखने लगे है | आर्थिक लोलुपता के कारण चारित्रिक एवं सामाजिक सनातन मूल्यों की पूर्णरूपेण अनदेखी कर दी गई है |

लॉकडाउन के समय में लोकतांत्रिक राष्ट्र के साक्षर शिक्षित नागरिकों, सर्वधर्म समभाव के अनुचरों, पाश्चात्य संस्कृति के उपासकों, आधुनिकता के अनुयायियों, व्यक्तिगत स्वतन्त्रता सेनानियों तथा तकनीकी के पुजारियों के सामने चुनौती है, कि इस गृहबंदी के समय में क्या करें ? उनके लिए अशिक्षित (निरक्षर) कहे जाने वाली हमारी दादी-नानी, माताएँ-बहनें, शिक्षित (साक्षर) गृह प्रबंधिकाएं तथा खेत-खलिहानों में अपने परिश्रम एवं पसीने से धरती की कोख से अन्न पैदा करने वाले किसान-श्रमिक, हस्त-उद्योग तथा नृत्य-संगीत से जुड़े लोग प्रेरणा स्रोत हैं | आवश्यकता इस बात है कि हम सब वैश्विक आपदा की इस घड़ी में, कोरोना वाइरस से जंग को जीतने के लिए लागू लॉकडाउन के समय में स्वयं को पहचानें | अपनी रुचियों के विषय में सोचें और रचनात्मक अभिवृतियों को सृजनात्मकता में बदलने का प्रयास करते हुये कौशल विकास (स्किल डवलपमेंट) में भागीदारी निभाएँ |

शत्रु अदृश्य है, मुझे यहाँ भागवत गीता के अध्याय 2 के श्लोक 23 का स्मरण हो आया है, जिसमें आत्मा के विषय में कहा गया है – “नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः । न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः” ॥ अर्थात शस्त्र से जिसे काट नहीं सकते, आग जिसे जला नहीं सकती, जल जिसे गला नहीं सकता और वायु जिसे सुखा नहीं सकती, आत्मा ऐसी है | आज की परिस्थितियों में विश्व समुदाय के पास भी ‘कोरोना वाइरस नामक दैत्य आत्मा’ को खत्म करने के लिए कोई औषधि एवं हथियार नहीं है | इसलिए यदि कोरोना को हराना है, तो प्रत्येक भारतीय को ‘सकारात्मक सोच एवं सामाजिक दूरी के साथ-साथ आत्म-विश्वास, आत्म-अनुशासन, आत्म-संयम और आत्म-चिंतन रूपी हथियारों के साथ आगे बढ़ने की आवश्यकता है’ |
\परिवार सामाजिक ढाँचे की आधारशिला है | लॉकडाउन में हमें इच्छा-अनिच्छावश लंबे समय तक परिवार के साथ रहने, एक-दूसरे की पसंद-नापसंद का ध्यान रखने और परस्पर स्वैच्छिक सहयोग करने का अवसर मिला है | अपनों के साथ अनमोल पलों को स्मरणीय बनाकर रिश्तों की आत्मीयता महसूस कीजिये | संभव है माता-पिता, सास-ससुर, भाई-बहन, पति-पत्नी, देवर-भाभी, ननद-बहू और पुत्र-पुत्री के रिश्ते में छिपा अभिन्न मित्र आपको घर में ही मिल जाए |

नौकरीपेशा होने का मतलब यह कदापि नहीं कि घरेलू कार्यों की अनदेखी की जाए | समयाभाव के कारण घर में उपेक्षित कर दिये गए कोनों से दोस्ती कीजिये, आत्मीयता और देखभाल से निर्जीव भौतिक वस्तुओं में भी चमक आ जाएगी | आत्मसंतोष और सुखानुभूति हेतु अपने और परिवार के लिए कुछ मनपसंद व्यंजन बनाइये, जिन्हें लॉकडाउन में बाहर से नहीं मंगवा सकते | तरुण-युवा-प्रौढ़ पीढ़ी इस गलत फहमी को मन से निकाल दे कि उन्हें खाना बनाना नहीं आता | यूट्यूब पर जाइए अनेक व्यंजनों को बनाने की विधियाँ सहज रूप में आपकी सहायता के लिए उपलब्ध हैं |

प्रतिस्पर्धा का सर्वमान्य सिद्धान्त समानता है, लेकिन मनुष्यों की बुद्धिलब्धि (IQ), रुचियों, व्यवहार, आचरण और आदतों में विभिन्नता स्वाभाविक है, इसलिए प्रतिस्पर्धा स्वयं से कीजिये | परिजनों, सहयोगियों और मित्रों की उपलब्धियों से घबराकर स्वयं को असक्षम समझने की भूल कदापि नहीं करनी चाहिए | निजी एवं व्यावसायिक जीवन में सफल एवं अनुभवी परिजनों, मित्रों और सहयोगियों से परामर्श लेकर उनका अनुकरण कीजिये | स्वाध्याय एवं सकारात्मक सोच खुशहाल जीवन का मूल-मंत्र है |

हमारी अपनी समृद्ध सम्पन्न सनातन संस्कृति है | पाश्चात्य संस्कृति की ओर आकर्षित होना अनुचित नहीं, लेकिन उसका अंधानुकरण आत्मघाती कहा जाना भी अतिशयोक्तिपूर्ण नहीं होगा | इससे बचने की आवश्यक है जैसे- जंकफूड, निजी स्वतन्त्रता के नाम पर अमर्यादित आचरण, अशोभनीय अर्धनग्न वेषभूषा और भाषा की फूहड़ता तथा कटुता से परहेज़ किया जा सकता है | बुजुर्गों ने कहा हैं – ‘भोजन स्वरुचि अनुसार ग्रहण करना चाहिए और वस्त्र संस्कृति अनुकूल धारण करने चाहिए’ | सारांश यह है कि सभ्यता, संस्कृति, पर्व-त्यौहार, रीति-रिवाज, रहन-सहन, वेषभूषा, खान-पान और भाषाओं की विविधता की जड़ में वातावरण, प्रकृति और जलवायु का अपना वैज्ञानिक महत्व है | भारत में कहावत प्रचलित है – “कोस-कोस पर बदले पानी, चार कोस पर वाणी” अर्थात प्रत्येक 3 किलोमीटर पर पानी का स्वाद और 12 किलोमीटर पर बोली (भाषा) की विविधता को देखा जा सकता है | ऐसे में पाश्चात्य संस्कृति का अनपेक्षित अनुकरण घातक सिद्ध हो सकता है | संकट की इस घड़ी में तथाकथित सम्पन्न विकसित राष्ट्र भी भारतीय परम्पराओं, भारतीय चिकित्सा पद्धति और सर्वहित में लिए जा रहे सरकारी निर्णयों का प्रसन्नता के साथ अनुसरण करते नजर आ रहे हैं | चिंतन-मनन कीजिये और विचारों को शब्दों में पिरोकर लेखनी द्वारा साहित्य का सृजन कर दीजिये, कलम उठाइए, आप भी लेखक हैं |
दूर-संचार के साधनों की आवश्यकता को नकारा नहीं जा सकता और मीडिया की भूमिका को नजर अंदाज किया जाना भी संभव नहीं है | इनके माध्यम से ही घर बैठे देश-विदेश में रहने वाले अपनों से प्रत्यक्ष-परोक्ष संपर्क एवं वार्तालाप के साथ-साथ वैश्विक घटनाओं और गतिविधियों की सूचनाओं को प्राप्त कर इन सबका आनंद लीजिये | लॉकडाउन में भी तकनीकी एवं मीडिया हमारे ज्ञानार्जन तथा मनोरंजन का सुलभ साधन हैं | घर बैठे इंटरनेट संसार से संतुलित सीमा तक जुड़े, वहाँ तक उचित है, लेकिन इसे और इससे जुड़ी सोशल साइटस को ही अपनी दुनिया मत बनने दीजिये | अंत में कहना चाहूंगी ‘अनजाने मित्र से जाना-पहचान दुश्मन अच्छा है” | लॉकडाउन बंधन का नहीं – आत्म-मंथन, आत्म-चिंतन और आत्म-अवलोकन का समय है, इसका भरपूर आनंद लीजिये !!

प्रो. (डॉ.) सरोज व्यास

*** प्रो. सरोज व्यास, फेयरफील्ड प्रबंधन एवं तकनीकी संस्थान, कापसहेड़ा, नई दिल्ली (सम्बद्ध- गुरु गोविंद सिंह इंद्रप्रस्थ विश्वविद्यालय, दिल्ली) में डाइरेक्टर के पद पर कार्यरत है। डॉ. व्यास संपादक, शिक्षिका, कवियत्री और लेखिका होने के साथ-साथ समाज सेविका के रूप में भी अपनी अलग पहचान रखती है। इनकी पुस्तकें विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम में सम्मिलित हैं । प्रो. व्यास 2005 से इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय के अध्ययन केंद्र की इंचार्ज भी है । अनुसंधान में विशेष रुचि तथा राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक और समसामयिक घटनाक्रमों पर पैनी नजर रखने वाली प्रो. व्यास के समालोचनात्मक तथा विश्लेषणात्मक लेख समय समय पर विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहते है।

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