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क्रांति की ओर झारखण्ड की पत्रकारिता

क्रांति की ओर झारखण्ड की पत्रकारिता

आधुनिक युग में बदलते समय के साथ पत्रकारिता में, सूचना क्रांति के आधुनिक विस्फोट के बाद उसकी कई विधाओं का विकास हुआ…आज देश में लगभग लगभग 62484 पंजीकृत अखबारों और 700 से अधिक न्यूज़ चैनलों के साथ हिंदुस्तान की मीडिया ने पूरे विश्व में अपनी स्वछंदता को लेकर एक खास जगह बनाई है| बदलते समय के साथ पत्रकारिता में भी कई बदलाव हुए हैं| फ़लस्वरूप प्रकारिता में भी उतार चढ़ाव आते गए| पत्रकारिता का भारत की राजनीतिक स्वाधीनता के साथ-साथ भारत के सामाजिक और आध्यात्मिक मूल्यों की रक्षा में प्रमुख योगदान रहा है| वह आज की भांति केवल घटनाओं की जानकारी देने तक सीमित नहीं है, बल्कि वह घटनाओं की देश और जन सरोकारों के परिप्रेक्ष्य में विश्लेषण भी करने का काम कर रही है| तब जान जोख़िम में डाल कर पत्रकारिता करनेवालों का कोई खेवनहार भी नहीं हुआ करता था, नांही पत्रकारों के साथ ठोक-ठेठा कर खड़ी होनेवाली कोई संस्था, नतीजतन पत्रकार मारे जाते थे उनके शोषित और प्रताड़ित होने का सिलसिला चलता रहता था|
देश की स्वाधीनता के बाद स्थितियां बदलीं। स्वाधीनता मिलने के बाद से ही पत्रकारिता के इस भारतीय स्वरूप के सामने चुनौतियां भी बढ़ी, दरअसल आज भारत में पत्रकारिता के समक्ष तीन प्रकार की कठिनाइयां हैं। पहली फाइनेंसियल, दूसरी स्वतंत्र समाचार पत्रों का पूंजीवादियों से संबंध जो समाचार पत्रों को बाजारवाद के हवाले कर चुके हैं और उनके द्वारा संपादकों द्वारा चंद लोगों के हितों के विरुद्ध किसी भी विचार को प्रकाशन से रोका जा रहा है। तीसरी और आखरी समस्या है व्यावसायिक पत्रकार, जो अपने करियर की आवश्यकता की पूर्ति हेतू, पत्रकारिता के नैतिक मिशन को भूल रहे हैं|
वक्त के साथ पत्रकारिता का स्वरुप बदलने के फ़लस्वरूप कई परिवर्तन भी कालांतर में देखने को मिले हैं| आज नए जोश और जूनून के साथ देश के युवा पत्रकारिता को मिशन के रूप में अपनाने को अग्रसर हैं| जहां निर्भीक पत्रकारिता के बदौलत उन्होंने पत्रकारिता की मिसाल पेश की है कई सनसनीखेज खुल्लासे किये, वहीँ ऐसे में उनके सामने कई चुनौतियां भी सामने आयी, कहीं पर पत्रकार, बौखलाए माफ़िया और अपराधियों के गोलियों के शिकार बने, तो कहीं सियासत और उसके नुमाइंदों के कारण मानसिक और शारीरिक प्रताडन सहते रहे |
समय-समय पर देश के पत्रकारों को सुरक्षा प्रदान करने के लिए, नई दिल्ली में प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया (पीसीआई) ने पत्रकारों की सुरक्षा के लिए एक विशेष कानून लाए जाने और ऐसे मामलों का सुनवाई फास्ट ट्रैक अदालतों में कराए जाने की मांग की| तब एक बयान जारी कर पीसीआई ने कहा था कि बीते दो दशकों में पत्रकारों से जुड़े ऐसे 96 फीसदी मामलों में कभी कोई तर्कसंगत परिणाम तक नहीं मिला, काउंसिल ने संपादकों/प्रबंधकों और देश के सभी सक्रिय पत्रकारों से इस बारे में एक अभियान चलाने का आह्वान किया, जिससे आम नागरिकों को पत्रकारों की हत्या करके खुलेआम घूम रहे अपराधियों के बारे में जागरूक किया जा सके|
इस बावत यूनेस्को की महानिदेशक आइरीना बोकोवा ने भी पत्रकारों पर इन हमलों पर प्रतिक्रिया देते हुए देश की प्रशासन से पत्रकार हत्याकांड की पुख्ता जांच करवाने और दोषियों को दण्ड दिलवाने की मांग की, बोकोवा ने कहा था कि अभिव्यक्ति की आजादी पर मंडराते खतरे को की गहरी जड़ें बनाने से रोकने के लिए कदम उठाए जाने चाहिए|
अगर एक चौंकाऊ सर्वे पर गौर करें तो अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्था की ओर से बनाए गए माफी सूचकांक 2011 के अनुसार पत्रकारों की हत्या की गुत्थी न सुलझा सकने वाले देशों में भारत 13वें स्थान पर आता है। सूचकांक के अनुसार भारत के पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान 10 वें और बांगलादेश 11 वें स्थान पर है। मुंबई में एक वरिष्ठ संवाददाता की हत्या के साथ ही पत्रकारों की हत्या से जुड़े मामलों के नहीं सुलझने की बात एक बार फिर सामने आ गई है। सूचकांक में ऐसे 13 देशों को शामिल किया गया है, जहां 1 जनवरी, 2001 से 31 दिसंबर 2010 के बीच हुए पत्रकारों की हत्या के पांच या ज्यादा मामले अनसुलझे हैं। कमिटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट (सीपीजे) की रिपोर्ट के अनुसार, भारत सात अनसुलझे मामलों के साथ 13 वें स्थान पर है। सीपीजे के अनुसार एक साल में पूरी दुनिया में होने वाले कार्य संबंधी हत्याओं में 70 प्रतिशत मामले पत्रकारों के हैं। सूचकांक में पत्रकारों की हत्या की अनसुलझी गुत्थियों का प्रतिशत वहां की जनसंख्या के अनुपात में निकाला गया है। सूचकांक में ऐसे मामलों को अनसुलझा माना गया है, जिसमें अभी तक कोई आरोपी पकड़ा नहीं गया है। सूचकांक के मुताबिक इराक पहले स्थान पर है। वहां चल रहे विरोध प्रदर्शनों और खतरनाक अभियानों के दौरान बहुत ज्यादा संख्या में पत्रकारों की हत्या हुई है। इराक में 92 मामले अभी तक अनसुलझे हैं, जबकि फिलीपींस में इनकी संख्या 56 है। इसके बाद श्रीलंका और कोलंबिया का स्थान आता है और अगर बात करें झारखण्ड/बिहार की तो यहां पत्रकारों पर न सिर्फ हमले बढे बल्कि कई पत्रकार मौत के घाट भी उतार दिए गए| पैरिस स्थित रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स की 2015 की रिपोर्ट पर गौर करें तो पत्रकारों के लिए खतरनाक देशों की सूची में भारत दुनिया में छठे नंबर पर आता है, इस साल नौ पत्रकारों की हत्या हुई थी जिनमें से कम से कम पांच अपनी ड्यूटी करने के दौरान ही मार डाले गए थे|
देश में पत्रकारों की सुरक्षा के लिए सियासी और सरकारी महकमे की उदासीनता के कारण अपराधियों के हौसले बुलंद होते गए, और झारखंड के चतरा में ताज़ा टीवी के 35 वर्षीय पत्रकार अखिलेश प्रताप सिंह की हत्या कर दी गई| अखिलेश की चिता की आग ठंढी भी नहीं हुई थी कि बिहार में भी 42 साल के पत्रकार राजदेव रंजन की 13 मई को सिवान रेलवे स्टेशन के पास कुछ अज्ञात हमलावरों ने गोली मार कर हत्या कर दी थी, हिन्दी दैनिक हिन्दुस्तान के सिवान ब्यूरो चीफ रंजन के सिर और गले पर लगी दो गोलियों के कारण उनकी जान चली गई, वे इलाके के कई आपराधिक तत्वों के खिलाफ अखबार में रिपोर्ट करते रहे थे| तब झारखण्ड में पत्रकार और पत्रकारिता हित की रक्षा के लिए संघर्षरत मान्यता प्राप्त संगठन झारखण्ड जर्नलिस्ट एसोसियेशन (JJA) ने प्रभावशाली प्रदर्शन किये संगठन से जुड़े पत्रकारों ने संगठन के प्रदेश अध्यक्ष शाहनवाज़ हसन के आह्वान पर दिल खोल कर दिवंगत पत्रकार के परिजनों की आर्थिक मदद की|
झारखण्ड राज्य देश का एकलौता ऐसा प्रदेश है जहां अकूत खनिज संपदाएं बिखरी पड़ी है, साथ ही कई संभावनाएं भी यहां अंगड़ाई ले रही है | कुदरत ने इस प्रदेश को अपार नेमतें बख्शी हैं | वन्य प्रदेशों और वन्य जीवों से भरपूर झारखण्ड में पत्रकारिता की भी काफी उर्वरा स्थिति रही है | यहां के पत्रकार तमाम प्रतिकूलताओं के बावजूद पूरी निष्ठा से अपने कर्तव्य का निर्वहन करते रहे हैं | अपने कार्यों के दौरान समय समय पर जहां वे कई दफा चोटिल हुए, कभी अपनी जान गंवाई, तो कभी सियासत और महकमों का उन्हें कोपभाजन भी बनना पड़ा है | ऐसी परिस्थिति में पत्रकारों का उत्पीडन रोकने और पत्रकारिता के मापदंडों की रक्षा के लिए, कई दफ़ा झारखण्ड में एक सशक्त पत्रकार संगठन की सथापना की कोशिशें होती रही | इसके लिए कई संस्थाएं भी बनी, लेकिन पत्रकारों की आवाज़ की गूंज राज्य और देश की फलक पर कभी भी सुनाई नहीं दी | राज्य के इतिहास में ये पहला मौका है, जब झारखण्ड में कार्यरत संस्था झारखण्ड जर्नलिस्ट एसोसियेशन (JJA) ने पत्रकारों को एकजुट कर उन्हें एक पहचान दी है, साथ ही उन्हें अपनी बातों को रखने का एक मंच प्रदान किया है | आज आलम यह है कि राज्य के सुदूरवर्ती ग्रामीण इलाके में भी अगर कोई पत्रकार प्रताड़ित होता है, तो उसकी आवाज़ प्रदेश की सियासी गलियारों की आवाज़ बन जाती है | झारखण्ड जर्नलिस्ट एसोसियेशन (JJA) आज झारखण्ड में अपने नेक उदेश्यों के साथ अपनी मंजिल की ओर अग्रसर है जहां पत्रकार हित की रक्षा के साथ साथ पत्रकारिता के सिद्धांतो की रक्षा का उदेश्य निहित है|
एक नज़र डालते हैं झारखण्ड जर्नलिस्ट एसोसियेशन (JJA) की उपलब्धियों पर :-
1. झारखण्ड के लगभग 2 हज़ार पत्रकारों का रांची में सेमिनार
2. सभी पत्रकारों का बीमा योजना की शुरुआत
3. पत्रकार आवासीय योजना की शुरुआत
4. छतीसगढ़ के तर्ज़ पर झारखण्ड में भी पत्रकार सुरक्षा क़ानून की निर्माण की मांग
5. चतरा के पत्रकार इन्द्रदेव की हत्या के बाद उसके परिवार की आर्थिक मदद
6. इन्द्रदेव यादव की हत्या के बाद सीबीआई जांच की मांग को लेकर JJA द्वारा राजभवन के सामने धरना
7. झारखण्ड के राज्यपाल से मिलकर पत्रकार सुरक्षा कानून लागू करने की मांग
8. संगठन से जुड़े पत्रकारों को परिचय पत्र उपलब्ध कराना
9. चेन्नई में आयोजित राष्ट्रिय अधिवेशन में झारखण्ड के पत्रकारों की दमदार उपस्थिति
10. संगठन द्वारा साप्ताहिक अखबार राष्ट्र संवाद का प्रकाशन
11. अखबार में मिले विज्ञापन की राशि से पत्रकारों के लिए 10 लाख रूपये का बिमा
झारखण्ड में पत्रकारों की एकता ने ये साफ़ कर दिया है कि वे अब पत्रकारिता हित के साथ-साथ अपने हितों की रक्षा में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे | संगठन में शक्ति है की कहावत को चरितार्थ करता झारखण्ड जर्नलिस्ट एसोसियेशन (JJA) ने पत्रकारों को उनकी शक्ति की याद दिलाया है| आज सच में ये पक्तियां झारखण्ड में चरितार्थ में हुई हैं कि “चलाओ न तोप न तलवार निकालो, जब तोप मुक़ाबिल हो तो अखबार निकालो” और अगर पत्रकारों की यही एकता और जिजीविषा रही तो वह दिन भी दूर नहीं जब पत्रकारिता झारखण्ड में अपने सर्वोच्च मानदंडों को छुएगी| साथ ही साथ मिलेगा देश और आवाम के लिए, अपना सर्वस्व न्योच्छावर करने को तैयार रहने वाले पत्रकारों
को उनका वाज़िब हक़ |
अरविंद प्रताप
संयुक्त सचिव
JJA
झारखण्ड प्रदेश

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