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हम सब विश्व स्वास्थ्य  संगठन एवं भारत सरकार द्वारा मानव हित तथा राष्ट्र हित में जारी किए गए निर्देशों का पूर्णतया पालन करें:सरोज व्यास

हम सब विश्व स्वास्थ्य संगठन एवं भारत सरकार द्वारा मानव हित तथा राष्ट्र हित में जारी किए गए निर्देशों का पूर्णतया पालन करें:सरोज व्यास

हम सब विश्व स्वास्थ्य संगठन एवं भारत सरकार द्वारा मानव हित तथा राष्ट्र हित में जारी किए गए निर्देशों का पूर्णतया पालन करें। इस अदृश्य आपदा से स्वयं तथा परिवार की रक्षा और सुरक्षा को घर पर रहकर ही सुनिश्चित करें।

विशेषकर पुरुषों, युवाओं तथा बच्चों के लिए अकारण 25 दिनों तक घर पर रहना किसी कठोर कारावास की सजा से कम नहीं है। लेकिन सोचिए अभी हमारे साथ परिवार है, जिसमें एकल और सामूहिक पारिवारिक संरचना के अनुसार सदस्यों का साथ है। उन लोगों के अनिश्चितकालीन एकांत की कल्पना कीजिए, जिन्हें इस वाइरस के कारण नितांत एकांत में भय, पीड़ा और अवसाद के साथ रहना पड़ रहा है।

अधिकांश वैश्विक जनमानस इतिहास का अध्ययन करते-करते आज एक नवीन इतिहास को बनते देख रहा है। 21वी सदी में यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि वर्तमान में शहरों, नगरों और महानगरों में रहने वाले कामकाजी लोगों के लिए, घर मात्र रात्रि विश्रामालय और परिजन सहयात्री जैसी भूमिका में है ।

अभिभावकों को लगता है कि वें इतना कठोर परिश्रम संतान के उज्जवल सुरक्षित भविष्य के लिए ही कर रहे हैं। ऐसे में भौतिक संसाधन और सुविधाएं बच्चों को उपलब्ध करवाकर अपने कर्त्तव्य की इतिश्री कर रहे हैं।
पाश्चात्य संस्कृति से प्रभावित भारतीयों ने भौतिक सभ्यता के साथ साथ अभौतिक संस्कृति को धीरे-धीरे कब गले लगा लिया इसका उत्तर सम्भवतया हमारे पास नहीं है ।
ऐसे में मीडिया द्वारा चीन में पांव पसारते अदृश्य संकट “कोरोना वाइरस” की सूचना दिसंबर 2019 से ही दी जा रही थी। जनसंख्या में प्रथम और अर्थव्यवस्था की दृष्टि से विश्व के नंबर दो पर कहे जाने वाले देश चीन के लिए विश्व को चिंतित होने की आवश्यकता नही थी ।शायद अर्थव्यवस्था की नकेल को मजबूती से अपने हाथों में रखने वाले एवं तथाकथित तानाशाह कहे जाने वाले चीन के लिए भी प्राथमिक स्तर पर “कोरोना वाइरस” की हैसियत चींटी समकक्ष ही रही। काश शक्तिशाली तथा सम्पन्न राष्ट्र चीन “कोरोना वाइरस” से उत्पन्न होने वाले भयावह परिणामों की गंभीरता को उस समय देख-समझ लेता तो आज विश्व जनमानस हर पल मृत्यु के अदृश्य भय से डर-डर कर जीने को मजबूर नहीं होता।

विश्व के देशों द्वारा भी व्यक्तिगत, सामाजिक, प्रशासनिक एवं वैश्विक तौर पर पल-पल दस्तक देती भावी भयावह आपदा के संकेतों को अनदेखा किया जाना स्वाभाविक था- “जिसके पैर फटे न बिवाई, वह क्या जाने पीर पराई” जैसी कहावतों को चरितार्थ करना भी तो हम सबका धर्म हैं।

जब अचानक चीन की चींटी (कोराना वाइरस) एक से दूसरे और दूसरे से तीसरे होते हुए पड़ोसियों, द्वीपों, महाद्वीपों एवं सात समुद्र पार कर विश्व में तबाही मचाने लगी, तब हम भारतीयों की भी तंद्रा भंग हुई । यूरोपीय देशों विशेषकर इटली, फ्रांस और स्पेन में “कोरोना वाइरस” के कारण अविश्वसनीय मौत के आंकड़ों ने सम्पूर्ण विश्व को भयभीत कर दिया हैं । भारत में मार्च के प्रथम सप्ताह में पहले विद्यालयों तथा बाद में समस्त शैक्षिक संस्थानों को बंद करने का फैसला लिया गया । तदुपरान्त धीरे-धीरे सरकारी तथा निजी संस्थानों, संगठनों, सिनेमाघरों, भोजनालयों, व्यायामशालाओं, विशालकाय बाजारों (माॅल) तथा कल-कारखानों को भी बंद करने की घोषणा की गई।

19 मार्च, रात्रि 8 बजे प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी राष्ट्र को संबोधित करते हैैं । अधिकार पूर्वक समस्त भारतीयों से रविवार, 22 मार्च को “जनता कर्फ्यू” अर्थात आत्मानुशासन के तहत घरों में बंद रहने एवं शाम 5 बजे 5 मिनट के लिए ताली, शंख, घंटी एवं अन्य किसी भी वाद्ययंत्र को बजाकर देवदूतों ( डॉक्टर, नर्स, कंपाउंडर, पैरामेडिकल स्टॉफ, पुलिस, मीडिया कर्मियों, सफाई कर्मचारियों तथा दैनिक अनिवार्य आवश्यकताओं की पूर्ति करने वाले लोगों) का आभार व्यक्त करने का आग्रह करते हैं। लगभग समस्त भारतीयों ने प्रधानसेवक के इस आग्रह का सम्मान भी किया । दूसरी ओर विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने 31मार्च तक लाॅकडाउन की घोषणा कर दी। लोग कहां मानने वाले थे, ऐसे लोगों को उलाहना देना भी अनुचित होगा। कुछ अपवादियों को छोड़कर अन्य सभी किसी ना किसी मजबूरी के कारण ही सड़कों पर निकले होंगे। कारण स्पष्ट था, मृत्यु के भय ने सभी को अनुशासित कर दिया था। प्रत्येक को “जान है तो जहान है” लोकोक्ति याद आ गई।

24 मार्च, रात्रि 8 बजे, प्रधानमंत्री जी का पुनः राष्ट्र को संबोधित करने के निर्णय से ही भारतीय समझ चुके थे कि विश्वव्यापी आपदा ने भारत में प्रवेश ही नही किया अपितु जड़ें जमाने को भी आतुर है। सम्पूर्ण भारत में 21 दिन का लाॅकडाउन, घर के मुख्य द्वार पर “लक्ष्मण रेखा” खींचने का कठोर आग्रह और सभ्य शब्दों में कर्फ्यू की चेतावनी सब कुछ अपेक्षित और आवश्यक था। प्रधानमंत्री द्वारा समस्त भारत वासियों से मीडिया कर्मियों, स्वास्थ्य सेवाओं में लगे लोगों और पुलिस प्रशासन का सहयोग करने का विनम्र निवेदन तथा निर्देशों/आदेशों का अनुपालन करने की भावात्मक दुहाई और वैधानिक चेतावनी दी गई । इसके पश्चात केंद्र एवं राज्य सरकारों द्वारा आवश्यक दिशा-निर्देश एवं आदेश प्रसारित तथा प्रचारित किए गए । अस्पतालों में स्वास्थ्य कर्मियों द्वारा मोर्चा बंदी की गई, तो वहीं सड़कों पर पुलिस द्वारा किले बंदी को अधिक प्रभावी रूप से अंजाम दिया गया।

यहां मुझे हिन्दी फिल्म का डाॅयलोग याद आ गया, “थप्पड़ से डर नहीं लगता साहब, प्यार से लगता है” । बार-बार राजनेताओं, मंत्रियों और बुद्धिजीवियों के मुखारविंद से सरकार द्वारा आर्थिक सहायता की मांग उठ रही है और पूरी भी हो रही है।

इसके उपरांत भी व्यक्तिगत रूप से मैं मोदी जी और राज्यों के मुख्यमंत्रियों से बहुत नाराज़ हूं । आज प्राथमिक कक्षाओं में अध्यापकों द्वारा रटाई गई, अब्राहिम लिंकन की लोकतंत्र की परिभाषा -”जनता का, जनता के लिए और जनता द्वारा शासन” याद आ गई।

अब प्रश्न यह उठता है कि मंदिर, मस्जिद, चर्च और गुरुद्वारे किसके अधीन आते हैं ? यदि ईश्वर के अधीन हैं, तब सरकार और प्रशासन कैसे इन्हें बंद कर सकते हैं ? जहां मौलाना/मौलवी/काजी, मंहत/पुजारी/पंडित, पादरी/फादर और ग्रंर्थी/गुरुजी धरती पर ईश्वरीय शासन तंत्र में विभिन्न समाजों द्वारा नामित प्रतिनिधियों के रुप में नियुक्त हैं । वहां आपदा की इस भयावह संकट की घड़ी में क्या इन भगवान के प्रतिनिधियों का कोई कर्त्तव्य बनता है अथवा नहीं ? यह यक्ष प्रश्न मुझे विचलित कर रहा है । प्रधानमंत्री जी और मुख्यमंत्रियों से नाराजगी इस बात की भी है कि भगवान के उपरोक्त वर्णित धर्माधिकारियों के लिए क्यों कोई आदेश/निर्देश नहीं ?

भारत सरकार द्वारा निर्धारित आय पर वार्षिक कर (इनकम टैक्स) तथा अन्य करो का भुगतान इच्छा और अनिच्छा से प्रत्येक भारतीय कर रहा है । कारण बताने की आवश्यकता नहीं है, देश की प्रगति, समृद्धि, विकास और नीतियों के धरातलीय क्रियान्वयन के लिए इस अनिवार्य कर्त्तव्य का पालन करना आवश्यक है। अन्यथा कानूनी नोटिस का डर, कार्यवाही का भय और दंड का विधान सीधा परिलक्षित होता है।

इसके विपरीत भगवान के घरों में आस्था और भयवश आम और खास, गरीब और अमीर सभी श्रद्धालु स्वैच्छिक कर का भुगतान प्रतिदिन, साप्ताहिक, पाक्षिक, मासिक, त्रैमासिक, छमाही और वार्षिक रुप से लाखों-करोडों में देते हैं। इस निर्विवाद सत्य को स्वीकारने में किसी को भी संकोच नही होना चाहिए कि यह एकत्रित धन तथा निधि विभिन्न प्रकार के करो से संग्रहित धन से अधिक है। यदि वैश्विक संकट की इस घड़ी में मानवता, मानव तथा राष्ट्र को बचाने के लिए इसका उपयोग नहीं किया जायेगा तो फिर कब किया जायेगा ? यही मेरा यक्ष प्रश्न है। पाठकों के पास इसका कोई उत्तर हो तो अवश्य मेरा मार्गदर्शन करें।

सरोज व्यास

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