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जितना शोषण मीडिया में पत्रकार का  है, शायद ही और कही हाे..

जितना शोषण मीडिया में पत्रकार का है, शायद ही और कही हाे..

दिनभर अपने मालिक को यस् सर नो सर कहो।
किसी खबर को कवर करने में जेब से पैसा खर्च करो।
लेट खबर भेज पाए तो डांट खाओ ।
अच्छी खबर भेजो तो उसमे अपने नाम के साथ ब्यूरो का नाम भी जुड़ा देखो।
खबर में मामला विवादित हुआ तो खुद झेलो। कोई हथेली नहीं लगाता।
तनख्वाह नाम मात्र की ।कुछ नामी अखबार तो अपने छेत्र के पत्रकारो को तनख्वा भी नहीं देते उल्टा जिला प्रभारी लेने की सोचता है। जिसमे आपका खर्चा भी नहीं निकलता।
हमेशा हटाये जाने निकाले जाने का भय।
न्यूज हैड बदलते ही आपके ऊपर गाज गिरने की सम्भावना।
वर्षों की तपस्या अनुभव की कोई कीमत नहीं
रोज एक दुश्मन पैदा करो
थैंक्सलेस जॉब। जिसमे जिसके लिए काम करते है। जिसकी वाहवाही करते है वह कभी धन्यवाद भी नहीं देता।
अलबत्ता जिसके खिलाफ खबर लगाते हो वह अनजाना व्यक्ति आपका दुश्मन जरूर बन जाता है।
पुरे समाज की आपसे अपेक्षा। उन्हें लगता है की यह तो आपका कर्म और उनका अधिकार है। तो आपको उनका कार्य तो करना ही होगा।
सभी समझते है की पत्रकार खूब पैसा कमाता है। उसे तो ऐसे ही पैसा मिल जाता है।
नेताओं की खबर खूब दिखाओ।
उन्हें भरपूर कवरेज दो। लेकिन जब विज्ञापन मांगने जाओ तो वे मुँह नाक बनाते है।
परिवार के काम छोड़कर खबर कवर करने जाओ। परिवार की नाराजगी हमेशा बनी रहती है।
किसी से अपनी मजबूरी भी नहीं बता सकते। कोई दुसरा काम नहीं कर सकते। आपकी झूठी शान आड़े आती है।
एक पत्रकार दूसरे पत्रकार को हेय नजरो से देखता है। आपसी प्रतिस्पर्धा के चलते वह आपका सबसे बड़ा शत्रु होता है।
समाज में कोई व्यक्ति अलग हटकर कार्य करता है तो उसकी खबर समाचार पन्नों पर जगह पा जाती है। लेकिन एक पत्रकार गलती से किसी फोटोग्राफ में दिख जाए तो वह फोटोग्राफ प्रकाशित नहीं होता है।
क्या आप पत्रकार है ? आपको हमेशा सन्देह की नजरों से देखा जाता है।
वर्तमान समाज में दिवंगत हुए कुछ पत्रकारों को ही सम्मान मिला है।
जिस पेशे में इतनी असुरक्षा । उसे समाज का चौथा स्तम्भ कैसे कहा जा सकता है
-साभार पत्रकार साथी

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