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डीएसएसएसबी: यहां सभी सोते हैं जबतक जगाया न जाए

डीएसएसएसबी: यहां सभी सोते हैं जबतक जगाया न जाए

दिल्ली अधिनस्थ सेवा चयन बोर्ड याानि डीएसएसएसबी का कामकाज भगवान भरोसे ही चलता है। नौकरी की चाहत में आज के जमाने में कौन युवा नहीं है। बात सरकारी नौकरी पाने की हो तो गला काट प्रतियोगिता का आलम ओलंपिक में मेडल जीतने से ज्यादा नहीं तो कम भी नहीं होता। पर डीएसएसएसबी के अधिकारी कान में तल डालकर ऐसे बैठे हैं कि बस पूछिये मत। चर्चा बिहार, यूपी, की होती है, तमाम सवाल खड़े किये जाते हैं। कहा जाता है कि देश के राज्यों में बुरा हाल है नौकरियों के लिए बनाये गये बोर्ड कुछ कर नहीं रहे हैं। जहां कुछ हो रहा है वहां या तो व्यापमं है या फिर हरियाणा जैसे किस्से। पर देश की राजधानी में क्या हो रहा है। इस पर भी नजर डालने की जरूरत है। डीएसएसएसबी में आवेदन किये सालों गुजर गये। लिखित परीक्षा का आयोजन कई साल तक किया ही नहीं। फिर परीक्षा हुई तो किसी न किसी बहाने रिजल्ट रोक दो। इन सब के बीच भ्रष्टाचार अपनी जगह चिर स्थायी तौर पर स्थापित है। सरकार में बैठे लोग बताते क्यों नहीं कि ये सब क्यों हो रहा है! अगर किसी परीक्षा में धांधली हुई तो कौन जिम्मेदार है! जो भी है उसकी गर्दन दबोचिये। पर ये तो होगा नहीं ! फिर क्या करें ! रिजल्ट रोक लो। जांच बैठा दो। और इस सबके बीच तारीख पर तारीख। क्योंकि कोई न कोई आजकल कोर्ट का दरवाजा खटखटा ही देता है। परीक्षा दे कर रिजल्ट का इंतजार कर रहे युवा हों या फिर आवेदन जमा करवाकर लंबे समय से पेपर होने का इंतजार कर रहे बेरोजगार, कोई नहीं चाहता कि मैं खुद आवाज बुलंद करूं सब सोचते हैं कि बिल्ली के गले में घंटी कोई दूसरा बांधे, पर मैं एक भले मानुष की तरह हर पचेंडे से दूर बस आराम से अपना कामधंधा संभाले रहूं।

2009 में डीएसएसएसबी ने प्राइमरी शिक्षकों की भर्ती निकाली। 2014 में परीक्षा हुई और दिसंबर में रिजल्ट आया। नियुक्ति जुलाई 2015 में हो पायी। पूरे 6 साल लग गये। ऐसा ही हाल कई दूसरी भर्तियों का है। 2009 में ही पोस्ट कोड 90/9 दास ग्रेड 2 की भर्ती निकाली। कुल खाली पद 231 थे। कई साल के इंतजार के बाद परीक्षा हुई और पिछले महीने डीएसएसएसबी ने अभ्यार्थियों के परीक्षा में प्राप्त अंक अपनी वेबसाइट पर डाले। पर अंतिम रिजल्ट आने से पहले ही दिल्ली सरकार ने एक जांच बैठा दी। मसला ये कि इस बात की जांच होनी है कि सब कुछ ठीक ठाक रहा या नहीं। यानि धांधली तो नहीं हुई। बात ये थी कि 10 दिन में कमेटी अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप देगी, पर एक महीना गुजर चुका है। सफल उम्मीदवार दिवाली से पहले दिवाली मनाने की तैयारी में थे पर उम्मीदों पर ग्रहण लग गया। रिपोर्ट अगर उम्मीदवारों के हक में आयी तो इस बीच कोई न कोई असफल उम्मीदवार कोर्ट में अर्जी लगाकर परीक्षा रद्द करने की गुहार लगा चुका होगा। अगर रिपोर्ट में परीक्षा में धांधली का पेंच फंसा तो पिछले 6 साल की कवायद टांय-टांय फिस्स होनी तय मानिये।

ये सब क्यों हो रहा है। स्कूलों में शिक्षकों की कमी का रोना रोया जाता है, पर डीएसएसएसबी कई परीक्षाओं जिनमें टीजीटी और पीजीटी शामिल हैं उनके रिजल्ट निकालने की बजाय चैन की बंसी बजा रहा है। कोई टाइम फ्रेम नहीं कोई वर्क कल्चर नहीं। दुख इस बात का है कि ये सब देश की राजधानी दिल्ली में हो रहा है। योग्य नौजवानों के सपनों को किस प्रकार से कुचल देना चाहिए इसके लिए डीएसएसएसबी एक बेहतर अनुसंधान संस्थान हो सकता है।

तो क्या हो ! कब तक चुप्पी साधी जाए ! कौन लड़े इस अन्याय से !

वे आवाज उठायें जो नौकरी की लाइन में ही नहीं हैं या फिर वे जो डीएसएसएसबी के जरिये रोजगार पाने की कवायद में जवानी से अधेड़ उम्र की ओर अग्रसर हैं या फिर दोनों तबके। शुरूआत तो कहीं न कहीं से करनी ही होगी। कामयाबी तभी मिलेगी जब हर कोने से संघर्ष में शामिल होने का जज्बा दिखेगा। डीएसएसएसबी को झुकाया जा सकता है, उसकी कार्यप्रणाली की मशीनगिरी में तेजी लाई जा सकती है। ये संभव है और ऐसा हुआ भी है। पोस्ट कोड 70/9, 71/9 और 101/12 के लिए नव शिक्षक निर्माण संगठन की अगुवाई में हुआ आंदोलन इसका एकमात्र उदाहरण हम सबके सामने हैं। वे नौजवान साथी जब एकजुट होकर निकले थे तो उनके मन में कुछ कर गुजरने का संकल्प था। सामने एक असंभव सा लक्ष्य था। पर तमाम जद्दोजहद और कठनाईयों के मंजिल पर जाकर ही चैन लेने वाले वे साथी जानते थे कि हम लड़े नही ंतो हार जायेंगे और हारना उन्हें मंजूर नहीं था। सोच बड़ी थी और योजना परिपूर्ण। सब केवल अपने काम में जुटे थे कहीं कोई दुविधा या उलझन नहीं थी। वे आगे बढ़े तो कदम मंजिल को छूने में सफल रहे। सफल इसलिए हुए क्योंकि वे सब एक दूसरे का हाथ पकड़े हुए थे, एक दूसरे को धक्का देकर आगे निकलने की बुरी सोच उनके पास कभी नहीं आ पायी। एकजुट रहे तो जीते भी। भला उनका भी हुआ जो घर से निकले भी नहीं थे। पर कोई मलाल नहीं, ये सब तो होता ही है। हर कोई थोड़े ही सिर पर कफन बांधता है, हां कामयाबी में हिस्सेदार सभी बनते हैं। इसके लिए एक कहावत है ‘नेकी कर कुएं में डाल’। अगर ये सोच लेकर कर आज के युवा डीएसएसएसबी से टकराने निकलें तो उन्हें कौन हरा सकता है! आज जरूरत इस बात की है कि सभी पोस्ट कोड चाहे उनकी परीक्षा आयोजित हुई हैं या नहीं या फिर परीक्षा हो चुकी है पर रिजल्ट किसी वजह से रूका हुआ है, वे सब अपनी जिम्मेदारी समझे। ये जिम्मेदारी हालांकि समाज के लिए कम उनके खुद के लिए ज्यादा होगी। उनको नौकरी मिलेगी तो परिवार आगे बढ़ेगा और समाज को वे कुछ दे पायेंगे। अब ये फैसला उनको करना है जो जिंदगी के वर्तमान में सुनहरे भविष्य की जद्दोजहद में उलझे हुए हैं। लड़ना है या नहीं !

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