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प्रदूषण के बारे में , सुध ना रही मोय

प्रदूषण के बारे में , सुध ना रही मोय

—चौं रे चम्पू! चेहरा की चमक और चिड़िया की चहक कहां गईं रे?

—सब धुधुधू की मेहरबानी! धुआं, धुंध और धूल! आप तो फिर भी मुस्कान बनाए हुए हैं। मेरी ग़ज़ल है, ‘ये घर है दर्द का घर, परदे हटा के देखो, ग़म हैं हंसी के अन्दर, परदे हटा के देखो। चिड़ियों का चहचहाना, पत्तों का सरसराना, सुनने की चीज़ हैं पर, परदे हटा के देखो।’ अचानक चिड़ियों का चहचहाना सुनाई नहीं दिया तो परदे हटाकर देखा। चिड़ियां ग़ायब!

—हां चिरैया नायं दीख रईं!

—कहां से दिखेंगी? शहरी कंकरीट के जंगल में कैसे बनाएं घोंसले? मोबाइल टॉवरों की किरणें पस्त कर देती हैं हौसले। भटका देती हैं राहों से। फसलों के विषाक्त रसायन भर देते हैं कराहों से। अंडे होते हैं कमज़ोर। टूट जाती है जीवन डोर। जब प्रदूषण धरती पर बैठता है, तो हर कीड़ा उल्टा होकर ऐंठता है। चिड़ियों को नहीं मिलता खाना, तो बताइए कैसे गाएंगी गाना? मालूम है चचा, कुमार गंधर्व को एक बार डॉक्टरों ने गाने से मना कर दिया था।

—मालुम ऐ! उनैं फैंफड़न की टीबी है गई!

—हां, जीवन से निराश थे! सन नब्वै में डॉ. मुकेश गर्ग ने उनका लंबा साक्षात्कार लिया था। कुमार गंधर्व ने उन्हें बताया कि लेटे-लेटे उन्होंने पंखे पर बैठी एक चिड़िया को देखा जो पूरा दम लगाकर गा रही थी। उन्होंने सोचा छोटी सी चिड़िया, नन्हा सा फेफड़ा! फिर भी आवाज़ दूर तक जा रही है। मेरे फेफड़े क्षयग्रस्त लेकिन बड़े हैं, मैं गाऊंगा।

—तौ मनैं करिबे के बाबजूद गायौ उन्नैं?

—पूरी लगन से गाया। एक नया राग बनाया, ‘लगन गांधार’। कोमल और तीव्र ‘ग’ के बीच एक और ‘ग’ लगाकर पूरी ताक़त से गाया, ‘सुध ना रही मोय… बाजे ले मोरा झांझरवा।’ सुना होगा आपने! प्राणों की ऊर्जा सुनाई देती है। उससे कंठ भी ठीक हुआ और फेफड़े भी। हम भी ठीक हो सकते हैं चचा! चिड़ियां वापस आ सकती हैं। लेकिन सुध तो रखें कि करना क्या है! मन आया तब सम-विषम लागू कर दिया, मन आया छोड़ दिया। एक मुख्यमंत्री कहते हैं कोई संगठन या सरकार वायु-गुणवत्ता में सुधार नहीं कर सकती। एक-दूसरे से मिल नहीं रहे। आप सन्न रहिए, वे कूड़े और अहंकार के टीले प्रसन्न हैं। मैं सोचता हूं कि फ़ौज क्या सिर्फ़ युद्ध के लिए है। चीनी सामान भले ही मत ख़रीदो, पर उनका मुफ़्त का ज्ञान तो ले लो। वहां प्रदूषण समाप्त करने के लिए सेना के हैलीकॉप्टर महानगरों पर पानी का छिड़काव करते हैं। पर इन्हें कोई सुध नहीं है। इनकी झांझरवा अपने तात्कालिक स्वार्थों के लिए बज रही हैं। अरे! कुछ करो भाई! मैं तो आम नागरिक हूँ, बड़े-बड़े डॉक्टर आपको समझा रहे हैं कि दिल्ली आपात्काल में जैसे-तैसे जी रही है। ऑल इंडिया मैडीकल एसोसिएशन के अध्यक्ष डॉ. के. के. अग्रवाल ने दिल्ली सरकार द्वारा आयोजित हाफ मैराथन दौड़ को स्थगित करने का ज्ञापन दिया है। मंत्रियो, मुख्यमंत्रियो! मीटिंग चंडीगढ़ में करो या बहादुरगढ़ में। कुछ तत्काल करो! परदे खोलकर मैं देखना चाहता हूं चिड़ियों का चहचहाना। उनकी चहक वापस आएगी, तभी तो सबके चेहरों पर चमक आएगी।

Ashok Chakradhar

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