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बवासीर आमतौर पर 40 से 60 वर्ष की उम्र में होता है यह रोग !

बवासीर आमतौर पर 40 से 60 वर्ष की उम्र में होता है यह रोग !

बवासीर जिसे अर्श एवं पाइल्स रोग भी कहते हैं! शारीरिक गतिविधिया कम करना, अधिक समय तक एक जगह बैठना, बैठे-बैठे कार्य को करना, शरीर में पानी की कमी होना, उसके कारण मलाशयऔर एनल कैनल के भीतर रक्त वाहिकाओ पर दबाव बढ़ जाता है! उसके कारण गुदा में सूजन एवं दर्द होता है बेहद तकलीफ देय होता है हकीकत अर्श खतरनाक रोग है! यह दो प्रकार के होते हैं! खूनी बवासीर और बादी बवासीर गुदानाल में वाहिकाओ की वे संरचनाएं जो मल नियंत्रण में सहायता करती हैं जब भी सूज जाते हैं और बड़े हो जाते हैं! रोगजनक या बवासीर कहा जाता है! खूनी बवासीर खूनी सुर्ख होते हैं, इसमें खून गिरता है, और बादी बवासीर काले रंग के होते हैं आमतौर पर 40 से 60 वर्ष की उम्र में यह रोग होता है! इससे पूर्व भी हो सकता है! कई बार यह बीमारी अनुवांशिक भी हो सकती है! जो पीढ़ियों से चली आ रही होती है, यह बीमारी इतनी खतरनाक है कि कई बार कैंसर रूप में भी परिवर्तित हो जाती है! मलाशय एवं गुदा की वाहिनी में सूजन आ जाती है, बवासीर को शरीर में फर्क के आधार पर देखें तो दो प्रकार की होती है बाहरी बवासीर एव आंतरिक बवासीर बाहरी बवासीर में रोगी की गुदा के आसपास बहुत अधिक मस्से हो जाते हैं ,इस में खुजली चलती है लेकिन दर्द नहीं होता है! लेकिन खुजली इतनी तेज होती है कि खुजलाने से खून आ जाता है पर आंतरिक बवासीर में फर्क इतना होता है यह मस्से गुदा के अंदर होते हैं जब व्यक्ति नित्य क्रिया के समय जोर लगाता है तो मस्से बाहर निकल आते हैं रोगी को असहनीय वेदना होती है, उसके कारण खून आने लग जाता है कई बार आंतरिक मस्से स्वतः अंदर चले जाते हैं और कई बार अंगली के माध्यम से अंदर धकेलना पड़ता है उस वक्त रक्त स्राव भी हो जाता है कुछ और भी लक्षण दिखाई देते हैं, खुजली इसका प्रमुख लक्षण है, मलाशय में ऐसा लगता है मानो कुछ अटक गया हो! बादी बवासीर वाले मस्से काले रंग के होते हैं! बवासीर में दर्द और जलन प्रमुख लक्षण है,
बवासीर होने से पूर्व के लक्षण करीब 1 माह पूर्व गुदा में खुजली, पेट का अपच होना मल में भयंकर बदबू आना, कई बार मल त्याग करने जाना, गुदा में अधिक पसीना आना, यह सभी संकेत मुख्य लक्षणों में कब्ज रहना पाइल्स होने के हैं, तली हुई वस्तु का सेवन नहीं करें कब्ज होने की संभावना पर हरी सब्जियों का उपयोग करें आमतौर पर आंतरिक बवासीर दर्द रहित होता है, चमकदार लाल रंग का होता है मल त्याग में जोर नहीं लगाएं मलाशय में जलन सूजन और गुदा में बेचैनी रक्त स्राव यह गुदा मार्ग की बीमारी है, चिकित्सा से पूर्व सर्वप्रथम कब्ज को दूर करना प्राणायाम, कपालभाति, से भीआराम मिलता है बवासीर पर अरंडी का तेल लगाना लाभदायक है, कब्ज के लिए ईसबगोल की भूसी नियमित लें, सूजन आने पर बर्फ के टुकड़े कपड़े में बांध का 10 मिनट तक गुदा द्वार पर रखें
चिकित्सा हलका आहार लें, ताजा फल हरी सब्जियों का सेवन करें, फलों के रस के बजाय फल का सेवन ज्यादा फायदेमंद होता है, छाछ बवासीर के मस्सों को खत्म करने में मट्ठा बहुत ही लाभदायक है छाछ में जीराएव नमक अवश्य मिलाएं, त्रिफला आयुर्वेद की रामबाण औषधि है, रात्रि को सोते समय एक से दो चम्मच पानी के साथ त्रिफला चूर्ण, खूनी बवासीर में काले तिल ताजा मक्खन के साथ लेना फायदेमंद है, हरीतकी चूर्ण एक चम्मच,एव गुड़ के साथ हरड़ खाने में बवासीर की समस्या नहीं रहती है, आंवला शरीर में आरोग्य की शक्ति बढ़ाता है आंवला चूर्ण को शहद के साथ पीना चाहिए नीम का तेल मस्से को लगाएं गाय का घी एक चम्मच शहद दोनों को मिला ले और बवासीर के मस्से पर लगाएं 1 सप्ताह में सूखने लगते हैं एलोवेरा खूनी बवासीर में लाभप्रद है आयुर्वेद पद्धति के अनुसार क्षार सूत्र विधि से उपचार किया जाता है मस्सों को क्षार सूत्र से बांध दिया जाता है और गुनगुने पानी में शुभ्रा भस्म डालकर रोगी को बैठा कर सेक किया जाता है स्वत ही मस्से कट कर अलग हो जाते हैं
रक्त का प्रवाह ज्यादा हो तो चिकित्सा साला लेकर निम्न औषधियां लेनी चाहिए
चंद्रकला रस125mg वोलवध्द रस 250 mg प्रवाल पिष्टी 250mgकहरवापिष्टी125mg pilex 2tabदिन में दो बार शौच जाने के बादapply in anus रात्रि को सोते वक्त दूध में एरंड तेल डालकर पीना चाहिए

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