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भाजपा राज में दलित का   होना ही क्या जुर्म है?

भाजपा राज में दलित का होना ही क्या जुर्म है?

रायपुर (रमेश कुमार ‘‘रिपु‘‘)। यह सवाल सोचने को विवश करता है कि आखिर क्या वजह है कि भाजपा शासित राज्यों में ही दलितों की पिटाई होती है? उन पर अगड़े उत्पात करते हैं। यह सवाल इसलिए भी है कि जातिगत उत्पीड़न के आकंड़े भाजपा शासित राज्यों में ही बढ़ रहे हैं। भाजपा के नेता दयाशंकर सिंह दलितों की महारानी,देश की सबसे अधिक ताकतवर दलित नेता बहुजन समाज पार्टी की मायावती को वेश्या से भी बद्तर कह डाला। जबकि राजनीतिक इतिहास यही कहता है कि जिस दल की ओर दलित का झुकाव होता है,उस दल की सरकार बनती है। 2009 में देश में भाजपा के प्रति 12 फीसदी हिस्सेदारी थी जो 2014 में बढ़कर 24 फीसदी हो गई और देश में भाजपा की सरकार बन गई। 84 आरक्षित लोकसभा सीट में से 40 सीट भाजपा को मिली। यूपी की सभी 17 सीटें भाजपा को मिली। तिलक,तराजू और तलवार का जुमला नये सियासी माहौल में दब गया है,लेकिन सच्चाई यही है कि भाजपा का सवर्ण मुख्यमंत्री हों या फिर ओबीसीे मुख्यमंत्री हों,। दलित सबसे अधिक उत्पीड़न के शिकार हुए है। भाजपा शासित राज्यों में सुरक्षित नहीं है दलित।

दलित दमन आखिर क्यों
छत्तीसगढ़ में रमन के राज में थाने में एक दलित की बेदम पिटाई से मौत हो जाना कई सवाल खड़े करती है। क्या यही रमन माॅडल है,जहां दलितों को थाने में ले जाकर उनकी जान जाने तक पिटाई की जाती है। उसकी देह पर लाठियों के इतने निशान है,कि इतना तो किसी आतंकी के शरीर पर पुलिस ने कभी डंडे नहीं बरसाए होंगे। कसाब को भी इतना नहीं मारा गया। वजीरे आला दलितों को रिझाने के लिए आरएसएस तो बहुत सी बातें कही है और कह भी रही है। वजीरे आजम भी दलितों केा लुभाने अबेंडकर की जन्मस्थली महू तक गए।सवाल यह है कि वोट की राजनीति का पाठ पढ़ने वाली भाजपा के राज में भी जुल्म ज्यादती का सिलसिला दलितों पर थम क्यों नहीं रहा है?

वर्दीधारी नक्सली
मुख्यमंत्री साहेब आपके राज में क्या किसी को बिजली मांगने,पानी मांगने और सड़क मांगने पर क्या पुलिस को इस तरह मारने का लाइसेंस आप दे रखे हैं। निश्चय ही आप कहेंगे नहीं। लेकिन सतीश कुमार नोर्गे के साथ पुलिस की बर्बरता तो यही कहती है। जेई से सतीश अपने साथी के साथ सिर्फ यही पूछने गया था कि बिजली कब आयेगी। यह तो उसका लोकतांत्रिक अधिकार था। इसके लिए पुलिस का आततायी होना यही दर्शाता है कि आपके राज्य में पुलिस, वर्दीधारी नक्सली है। जो अपना गुस्सा आम आदमी पर और दलितों पर उतारती है। टी.आई जीतेन्द्र सिंह जिसने अपनी वर्दी की ताकत उस पर इस कदर दिखाई कि लोगों की आॅखों में आंसू आ गए,लेकिन उसका दिल नहीं पसीजा। ऊपर से एस.पी अजय यादव का यह दावा कि हुडंदंगो ने उसे पीटा। यानी जिन्होंने देखा वो आॅखें झूठ बोल रही है। डंडे तो पुलिस वालों के पास होते हैं चैबीसों घंटे साहेब। पुलिस वालों को कम से कम यह तो सिखाइये कि झूठ भी सलीके से बोलें।

भाजपा राज में बेदम दलित
आंकड़े कहते हैं भाजपा राज्यों में दलितों का जीना मुश्किल हो गया है। यह आपकी गलती नहीं है,यह तो भाजपा शासित राज्यों में उनका रहना ही अपराध है। आंकड़े बताते हैं कि भाजपा शासित चार राज्य राजस्थान,गुजरात,मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ मेें देश के कुल अपराधों में हिस्सेदारी 31 फीसदी की है। मध्यप्रदेश में 53 फीसदी,छत्तीसगढ़ में 48 फीसदी, राजस्थान में 47 फीसदी गुजरात में 48 फीसदी दलित उत्पीड़न के शिकार हैं।

सतीश तुम वेमुला नहीं हो
सतीश कुमार नोर्गे,रोहित वेमुला नहीं है। इसलिए आप के राज में उतना हंगामा नहीं होगा। कांग्रेस और टूटकर बनी पार्टी छजका क्या कर लेगी? ज्यादा से ज्यादा आपकी सरकार का पुतला जलायेंगी या फिर बंद का आव्हान करेंगी। बस। पिटना तो हर हाल में दलित को फिर से है। इसलिए कि भाजपा शासित राज में रहते हैं। संध परिवार भले दलितों को लुभाने के लिए कहता है कि दलित परिवार को गोद लें और उनके साथ भोजन करें। गांव में भेद भाव के मद्देनजर,एक कुंआ,एक मंदिर और एक शमसान का नारा भी गढ़ा है। 2018 के चुनाव में दलित सतीश की मौत और आपके निवास के बाहर साहू की मौत आपकी सरकार के लिए कंटक सवाल बन जाएं तो आश्चर्य नहीं।

सियासी नौटंकी में माहिर
मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह चैहान तो दलितों को लुभाने के लिए सिंहस्थ में अमित शाह को अलग से वाल्मिक साधुओं के साथ स्नान कराने की योजना बनाई। लेकिन अन्य साधुओं ने इसका विरोध किया तो उन्होंने अपनी योजना बदल दी। इतना ही नहीं वे काल भैरव बाबा के मंदिर में भी दलित पुजारी रखने की बात कही। लेकिन शंकराचार्यो ने इसका विरोध किया तो माफी मांग ली। सियासी नौटंकी जितना अच्छा भाजपा वाले कर लेते हैं,शायद उतना कोई और नहीं।

रमन को जवाब देना होगा
सच ता यही है कि खैरलंाजी से उना, बदायूं से चैन्ने,और मिर्जापुर से मुंबई और शिवपुरी से छत्तीसगढ़ तक बदला कुछ नहीं है। केवल स्थान के नाम बदले हैं। कहानी वही है। सवाल यह है कि भाजपा शासित राज में किसी का दलित होना क्या अपराध है? रमन को जवाब देना होगा। इसलिए भी कि उनकी पार्टी के प्रधान मंत्री 5 अप्रैल को जब उद्यमियों के लिए स्टैंड अप इंडिया योजना की घोषणा करते हैं,उस वक्त उनकी पार्टी के 17 दलित सांसद भी थे। क्या मोदी बसपा के वोट बैंक में खलल डालने के लिए ऐसा किए है? नहीं तो फिर आपके राज में उना जैसे हालात क्यों हैं?
जान इतनी सस्ती क्यों
सवाल तो कई हैं,वजीरे आला,फिर भी बात चुभती है कि आपके राज में जान इतनी सस्ती क्यों है। आपका राज दलित राज नहीं है। आदिवासी राज है। लेकिन ये भी सुरक्षित नहीं हैं। सच यही है,स्वीकारने में आपको हिचक हो सकती है। बगैर आदिवासी मुख्यमंत्री के आदिवासियों का भला नहीं होगा,आपकी ही पार्टी के नेता ऐसा सवाल न करते। यह अलग बात है कि ऐसा सवाल करने वाले बायें कर दिए गए। आरएसएस के उस शख्स से पूछा जाना चाहिए कि दलितों के वोट के लिए अंबेडकर की ओर झुकने के लिए भाजपा को कहते हो,दलितों के यहां खाना खाने को कहते हो,क्या रमन से भी कहोगे सतीश की मौत पर उसकी तेरहवीं में पूड़ी खाकर उसकी आत्मा को सच्ची श्रद्धांजलि देना।

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