December 3, 2022

भारतीय भाषा आन्दोलन 25 अगस्त -2014 से देशव्यापी स्वरूप लेगा

संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षाओ में अंग्रेजी की अनिवार्यता की समाप्ति और भारतीय भाषाओ के प्रत्येक स्तर पर विकल्प की मांग को लेकर 1988 से चले भारतीय भाषा आन्दोलन की 26 वीं वर्षगांठ के अवसर पर भारतीय भाषा आन्दोलनकारियों की ओर से आज– संघ लोक सेवा आयोग के मुख्य गेट , शाहजहाँ मार्ग , नयी दिल्ली पर भावी रणनीति को लेकर सभी पुराने और वर्तमान आन्दोलनकारियों की एक महत्वपूर्ण संयुक्त ऐतिहासिक बैठक होनी थी लेकिन दिल्ली पुलिस की दमनकारी नीतियों के चलते ये सारा दिन गिरफ्तारियों के दौर में बदल गयी .

आज सुबह से ही भारतीय भाषा आन्दोलनकारी संघ लोक सेवा आयोग के गेट पर जमा होने लग गये थे लेकिन पुलिस उनको लगातार यहाँ से हिरासत में लेकर तिलक मार्ग थाने ले जाती रही. सुबह ग्यारह बजे वरिष्ठ भाषा आन्दोलनकारी श्री श्याम रूद्र पाठक के नेतृत्व में सेंकडो छात्रो का एक समहू जब संघ लोक सेवा आयोग की नयी अध्यक्ष डॉ. रजनी राजदान को पदभार ग्रहण करने की बधाई देने पहुंचा तो सभी को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया

इसके बाद दोपहर में श्री पुष्पेन्द्र चौहान की अगुवाई में दिल्ली विश्वविद्यालय के शिक्षको ,छात्रो और भाषा आन्दोलनकारियों के साथ बैठक के लिए आयोग के गेट के सामने पहुंचे तो उनको भी गिरफ्तार कर लिया गया . इस गिरफ्तारी में अस्सी वर्षीय वयोवृद्ध साहित्यकार और दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व प्राध्यापक डॉ. बलदेव वंशी , यूपीएससी भाषा आन्दोलन के प्रणेता श्री पुष्पेन्द्र चौहान , दिल्ली विश्वविद्यालय में भाषा आन्दोलनकारी डॉ. अमरनाथ झा , हिन्दू कॉलेज के डॉ. रत्न लाल , स्वामी श्रद्धानंद कॉलेज के डॉ. मनीष कुमार , ग्रामीण दिल्ली के आन्दोलनकारी डॉ. हरपाल रांणा , भारतीय भाषा आन्दोलन के महासचिव श्री देव सिंह रावत आदि के साथ सेंकडो युवको को गिरफ्तार कर किया गया और तिलक मार्ग थाने में बंद कर दिया गया .

इस गिरफ्तारी की निंदा करते हुए कई सांसदों – श्री शरद यादव , श्री पप्पू यादव और श्री धर्मेन्द्र यादव और आप नेताओ श्री योगेन्द्र यादव एवम श्री मनीष सिसोदिया ने इसकी भर्त्सना की है और कहा कि सभी शांति पूर्ण आन्दोलन करने वाले युवको को सुबह से दिल्ली पुलिस ने भूखा रखा हुआ है . अस्सी वर्षीय वयोवृद्ध साहित्यकार डॉ. बलदेव वंशी को भी पुलिस ने नहीं बख्शा है . उनकी थाने में तबियत खराब होने के बाद भी उन्हे उपचार की कोई सुविधा उपलब्ध नहीं करायी गयी .

थाने में ही हुई आन्दोलनकारियों की बैठक में सभी भारतीय भाषा आन्दोलनकारियों ने एकमत होकर 18 जनवरी 1968 के उस भाषाई संसदीय संकल्प को लागू करने की मांग को दोहराया जिसके अनुसार संसद ने इसे पारित करके संघ लोक सेवाओ और समस्त अन्य भर्ती की परीक्षाओ में भारतीय भाषाओ को अंग्रेजी के विकल्प के रूप में मान्यता दी थी . लेकिन दुर्भाग्य से संसंद के इस संकल्प को सरकार आज 46 वर्षो के बाद भी लागू नहीं किया है. और इसी का परिणाम है कि गत दो माह से देश भर में छात्रो का भाषा आन्दोलन अपना राष्ट्रव्यापी रूप ले रहा है . और सरकार इसका बर्बरता से दमन कर रही है . जबकि सारी समस्या का हल इसी संसदीय संकल्प – 1968 को लागू करके निकला जा सकता है .

सभी आन्दोलनकारियों ने मांग की है कि संसदीय संकल्प को लागु करने के लिए एक सर्वदलीय संसदीय समिति का गठन किया जाये जो देश की सभी क्षेत्रीय भाषाओ के प्रतिनिधिओं के पक्षों को सुनकर अपना निर्णय करे. इस बैठक में यह भी स्पष्ट किया गया कि इस आन्दोलन का विरोध अंग्रेजी से नहीं है और न ही इसकी मांग केवल हिंदी को लागु करवाना है . इस आन्दोलन का उदेश्य प्रत्येक स्तर से अंग्रेजी की अनिवार्यता को समाप्त करके भारतीय भाषाओ को लागू करवाना है – यह भावना 1968 के भाषाई संसदीय संकल्प में पहले से निहित है, यह अब ही उपजी कोई नयी मांग नहीं है.

सभी आन्दोलनकारियों ने यह भी कहा है कि सरकार की तानाशाही नीति के चलते संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा तिथि में कोई बदलाव नहीं किये जाने के कारण आन्दोलन से थके – हारे और पुलिस की पिटाई से घायल छात्र अब भी परीक्षा की तैयारी में जुटे हुए है उनके प्रति सबकी संवेदना तथा सहानुभूति तो है ही साथ – साथ उनके लिए शुभ कामना भी है . ये आन्दोलन परीक्षा समाप्त होते ही 25 -अगस्त से फिर एकजुट होकर राष्ट्रव्यापी रूप से चलाया जायेगा , जब तक सरकार देश की सभी प्रवेश , भर्ती और अन्य परीक्षाओ से अंग्रेजी की अनिवार्यता को समाप्त करके उस स्थान पर सभी भारतीय भाषाओ को उसका विकल्प नहीं बना देती है .इस आन्दोलन का केन्द्रीय स्थल जंतर – मंतर का धरना स्थल ही रहेगा .

इस बैठक में सरकार से यह भी अपील की गयी कि पिछले दो माह से जिन भाषा आन्दोलनकारी छात्रों पर पुलिस ने विभिन्न प्रकार से प्रताड़ित करने के उद्देश्य से मुकदमे बनाये है उन्हे सरकार तुरंत वापिस ले , इसके लिए एक ज्ञापन गृहमंत्री को भी जल्द ही मिलकर दिया जायेगा . इस ज्ञापन में यह भी मांग रखी जाएगी कि जिस प्रकार पुलिस ने बर्बर दमन किया और छात्रो को गंभीर चोटें आई है उनको तत्काल मुआवजा दिया जाये और इस मामले की उच्चस्तरीय जाँच करवाकर दोषी पुलिस अधिकारीयों को दण्डित भी किया जाये .

उल्लेखनीय है कि 18 जनवरी – 1968 को भारतीय संसद ने एक भाषाई संसदीय संकल्प पारित किया था . लेकिन इस संसदीय संकल्प के 20 वर्षो तक लागु नहीं होने के कारण 16 अगस्त – 1988 को संघ लोक सेवा आयोग के मुख्य गेट पर विश्व का सबसे लम्बा धरना आरम्भ किया गया था .जिसे 2002 तक श्री पुष्पेन्द्र चौहान और श्री राजकरण सिंह की अगुवाई में चलाया गया और फरवरी – 2002 में अटलबिहारी वाजपेई सरकार ने उखडवा दिया था. इसी की 26 वीं वर्षगांठ को फिर से इस मांग को उठाने की रणनीति पर विचार के लिए बैठक का आयोजन वर्तमान में चल रहे भाषा आन्दोलन को गति , उर्जा और रणनीतिक मार्गदर्शन देने के उद्देश्य से किया गया था .

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