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भारत को पुनः विश्व गुरू बनने के सपने को मूर्त रूप देने की ओर बढ़ते कदम : तिलक राज कटारिया

भारत को पुनः विश्व गुरू बनने के सपने को मूर्त रूप देने की ओर बढ़ते कदम : तिलक राज कटारिया

यूं तो आजादी के बाद हम हमेशा से ही कुछ न कुछ अपने कदम आगे बढ़ाते चल रहे हैं परन्तु गत्‌ पांच वर्षों में वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के कार्यकाल में देश ने जितनी तेजी से प्रगति की है वह इस बात का संकेत है कि गति और आचरण का संयोग बढ़ने लगा है क्योंकि गति के लिए चरण की जरूरत है और प्रगति के लिए आचरण की जरूरत है। एक भारतीय होने के नाते आज संतोष करने लायक विषय यह भी ध्यान करने योग्य है कि भारत आज विश्व में पॉजिटिव इमेज रखने वाला देश गिना जाने लगा है।

विश्व में व्याप्त हिंसा के माहौल में शान्ति प्रियता व लोकतंत्र का प्रहरी बनकर सूचना तकनीक में सर्वाधिक मजबूत स्थिति में खड़ा हुआ भारत प्रगति करता दिखाई देने लगा है। यदि कोई दूरदृष्टि से अवलोकन करे तो एक महत्वपूर्ण बदलाव देश में दृष्टिगोचर हो रहा है कि भारत आज अपना भविष्य बेहतर बनाने के लिए इन्वेस्टमेंट करता हुआ बढ़ रहा है। नए-नए हाईवे, नई तकनीक, नए विद्यालय, मैट्रो सिस्टम, पब्लिक ट्रांसपोर्ट में सीएनजी का इस्तेमाल और सौर ऊर्जा का उत्पादन अन्तिम पायदान पर खड़े व्यक्ति का उत्थान व विकास एवं समरसता को बढ़ावा देते हुए स्वास्थ्य व पर्यावरण की रक्षा तथा आतंकवाद को जड़ से उखाड़ फेंकने का बुनियादी आधार तैयार होता दिखलाई पड़ने लगा है।

भारत के खिलाफ यदि कुछ जाता है तो वह है भ्रष्टाचार, यह भारत के इमेज पर धब्बे के समान है। यद्यपि कांग्रेस के नेतृत्व व यूपीए के शासनकाल में हुए लाखों-करोड़ों रूपये के घोर घोटालों की तुलना में आज भाजपा के नेतृत्व में राजग सरकार पर अभी तक कोई घोटाले का दाग नहीं है। यह भी एक सुखद संकेत है।

यद्यपि गत्‌ 70 वर्षों में कैंसर के रूप में समाज के खून में व्याप्त भ्रष्टाचार एक शिष्टाचार के रूप में पनप चुका है। वह जिस तेजी के साथ प्रवाहमान है, कहीं वह सदाचार न बन जाए। यह चिन्ता का विषय है। इस पर विजय पाना अर्थात्‌ सिस्टम को शुद्ध करना एक चुनौती है। इस दिशा में यद्यपि इस बार संसद में रखे गए बिल में घूस देने वाला और लेने वाला दोनों ही समान रूप से दोषी है और दोनों पर ही दण्ड का प्रावधान है, एक सार्थक कदम है। परन्तु यह बिल कितना कारगर होगा, यह समय के भविष्य में छुपा है। बहरहाल, कुछ और उपाय करने की भी आवश्यकता है। अन्तयोदय से सर्वोदय तक सर्वांगीण विकास योजनाओं को समान रूप से आगे बढ़ाने की जरूरत है ताकि समाज आपसी मतभेदों से उपर उठकर मिलजुल कर अपने भारत की उन्‍नति को सर्वोच्च शिखर पर ले जाने में सफल हो सके | आज जातिवाद, वर्गवाद, क्षेत्रवाद प्रभावी हो रहा है। कोई अपने को जाट नेता कहलाने में गर्व महसूस करता है और कोई गुर्जर नेता, कोई पंजाबी नेता, कोई वैश्य, कोई बिहारी और कोई पहाड़ी आदि आदि । प्रश्न उठता है कि भारत माँ का गौरव प्रकट करने का सपना कौन साकार करेगा ? ये राजनेता तो सब कुछ समझते हुए भी ना समझ बनने का नाटक करते दिखाई पड़ते हैं क्योंकि जातीय अहम के भटकाव के कारण ही तो इनकी जय-जयकार होती है। इसी कारण ही ये नेता किसी न किसी जाति, वर्ग व समुदाय तक ही अपने को समेटे रहते हैं। मानो वर्ग व जाति समूह ही इनका हिन्दुस्तान है, भगवान है, सर्वस्व है। ये नेता अपनी जाति वर्ग समुदाय के लिए तो ऐसे कुतर्क करते हैं कि मानों इनकी जातीय हितों की अनदेखी हुई तो आज ही देश दूट जाएगा। क्‍या देश की एकता इतनी कमजोर है कि जो इन नेताओं की धमकियों से टूट जाएगी ? परंतु इन नेताओं के कुतर्कों के भ्रमजाल से व्यक्तिवाद को बढ़ावा जरूर मिल
रहा है।

यह भ्रमजाल का भटकाव ही है कि सब टहनी, फूल, पत्ते अपने को मूल पेड़ समझकर व्यवहार करते दिखाई पड़ते हैं। वर्गहित को समग्रता का हित समझने की भूल ही देश को टुकड़े-टुकड़े के रूप में देखने की प्रवृति को बढ़ा रही है। समय रहते यदि
राष्ट्र चेतना जागृत न हुई तो ये नेता व्यक्तिवादी हितों को समग्रता का हित करार कर सदाचार के रूप में रूढ़ करने में संकोच नहीं करेंगे।

समग्रता का विचार न करके – व्यक्तिवादी हितों की लड़ाई लड़ने का ही यह दुष्परिणाम है कि आज राजनीति जो सेवा का मार्ग समझी जाती थी, आज एक पेशे के रूप में निजी स्वार्थों की पूर्ति का माध्यम बन रही है इसलिए ही राजनीतिक दल,
राष्ट्र विकास के स्थान पर सत्ता पर काबिज बने रहने के लिए अनैतिक मार्गों का इस्तेमाल करने में कोई संकोच नहीं करते। मानो सत्ता पर काबिज होना, इसके लिए जोड़-तोड़ व दूसरों की टांग खिंचाई व चरित्रहनन करना ही राजनीति का मूल काम रह गया है। यही कारण है कि आज नेताओं की विश्वसनीयता समाप्त हो रही है। कहने को तो देश में नेताओं की एक लम्बी कतार हैं परंतु इनमें से कितने ऐसे हैं जो गांधी जी की
तरह ईमानदारी से गरीबों की मलिन बस्ती में साथ रहकर उनके सुख-दुख में भागीदारी करते हुए उनके कष्टों को दूर करने का प्रयास करते हैं। वस्तुत: स्थिति तो यह है कि वातानुकूलित कमरों में बैठकर देश की गरीबी, मंहगाई, शिक्षा व मकान, पानी, बिजली आदि की बुनियादी जरूरतों को पूरा हुआ दिखा दिया जाता है और बड़ी-बड़ी लम्बी ऊंची योजनाएं बनाई जाती हैं परंतु परिणाम क्या है गरीब और गरीब मूलभूत सुविधाओं
से वंचित और अमीर और अमीर बनता जा रहा है। दुर्भाग्य तो ये है कि देश में एक भी ऐसा कद्दावर नेता नहीं है जो समाज की मूल मर्ज पकड़ ले और सबको साथ लेकर देश को आगे बढ़ा ले जाए। यद्यपि श्री नरेन्द्र मोदी की कार्यशैली से यह आशाबोध जागृत होने लगा है कि देश में समुचित परिवर्तन लाया जा सकता है।

यद्यपि आज नेताओं के प्रति अविश्वास का माहौल देश में इसलिए दिखाई देता है क्योंकि इनकी कथनी और करनी में साफ अंतर दिखाई देने लगा है। एक समय था जब नेता के आह्वान पर समाज सर्वसमर्पण करने को तैयार हो जाता था। परंतु तब नेता सेवाभावी, ईमानदार तथा समाज समर्पित होकर पारदर्शिता के साथ अपना आदर्श प्रस्तुत करते थे। तभी इनकी आवाज में दम होता था। परंतु आज जब नेताओंकी विश्वसनीयता ही सन्देह के घेरे में है तो समाज विश्वास किस पर करे ? क्‍योंकि आज जो बाहुबली हैं वो ही नेता हैं। जो तस्करी करता है वो नेता कहलाता है। आज लोगों को नेता के नाम पर एक घिन्‍न आने लगी है। नेता शब्द ही मानो अविश्वास व बेईमानी का पर्याय बनता जा रहा हैं, 60 के दशक में तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री लाल बहादुर शास्त्री जी ने देश में अनाज की कमी आने पर आह्वान किया था कि इस कमी को दूर करने के लिए हम सब मिलकर सोमवार को व्रत रखें। उनकी अपील का कैसा जादू सा असर हुआ कि समुचा देश सोमवार का व्रत रखने लगा। इतना ही नहीं गली मौहल्ले का छोटा-मोटा ढाबा भी सोमवार को बन्द रहने लगा। परंतु आज तो कोई ऐसा नेता नहीं है कि जिसकी कथनी और करनी एक हो और इसलिए आज जब नेता आह्वान करता है तो उसका पड़ोसी भी उसको अनसुना कर देता है। आज देश आंतरिक व बाहूय संकटों से घिरा दिखाई देता है।

कश्मीर समस्या और आतंकवाद, नक्सलवाद चर्म सीमा पर है तथा बाहय दृष्टि से चीन व पाक जैसी शक्तियां आतंकवाद के सहारे देश को तोड़ने के षडयंत्र रच रही हैं तब भी देश के ये जातीय नेता अपने मतभेद भुलाकर व निजी हितों से ऊपर उठकर इन समस्याओं का समाधान करने की बजाय समस्याओं को बढ़ाने में अपना पौरूष प्रकट करते हुए दिखाई पड़ते हैं। ये नेता इतना ही नहीं अपने निजी हितों की पूर्ति हेतु एक-दूसरे की टांग खिंचाई करते हुए अनैतिक कार्यो में व्यस्त दिखाई देते हैं।

सोचने का विषय है कि क्या शुद्र स्वार्थों की पूर्ति करना ही राजनीति का काम है क्या ? जब देश पर संकट के बादल मंडरा रहे हो तब भी ये नेता अपने मतभेद भुलाकर एकजुट होकर राष्ट्र रक्षा के लिए एकजुट नहीं होते तो देश इनसे क्‍या उम्मीद करे ? आज देश का विश्वास हिलता नजर आ रहा है। ऐसे बौने नेताओं से देश अपने को शर्मिेन्दरा महसूस करने लगा है। बाहय शक्तियों से ज्यादा खतरनाक तो ये हमारे नेता दिखाई देते हैं जो माँ भारती के अन्न-जल पर पलने के बाद भी भारत माँ के दूध की लाज नहीं रख सकते। उल्टे आतंकवाद के सामने नतमस्तक हुए दिखाई पड़ते हैं। इस स्थिति में सभी राष्ट्रवादी शक्तियों को एकजुट होकर पहले इन नेताओं से ही निपटना पड़ेगा, तब जाकर देश की रक्षा संभव हो सकेगी। अतः मूर्धन्य समाज में अपने से शुरूआत करनी पड़ेगी और सकारात्मक शक्तियों को सहयोग देकर भ्रष्टाचार के कैंसर को सदा-सदा के लिए विदा करने की पहल को अमली जामा पहनाना होगा।
तभी बनेगा विश्व गुरू भारत !

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