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भारत विश्वगुरु क्यों, कब, कैसे ? : गोपाल प्रसाद

भारत विश्वगुरु क्यों, कब, कैसे ? : गोपाल प्रसाद

जब हम भारत के विश्वगुरु होने की बात करते हैं तो मन में सर्वप्रथम यह प्रश्न उभरता है कि आखिर ऐसा क्यों, कब और कैसे होगा? मेरे विचार से इस विषय को साहित्य, पद्धति, उदहारण एवं समाधान में वर्गीकृत करके बताया जा सकता है. हमारा प्राचीन भारत ऋषि मुनियों एवं गुरुकुल का देश रहा है, जो आध्यात्मिक पुनर्जागरण के स्वर्णिम कल में सोने की चिड़िया के रूप में प्रसिद्ध रहा है. इस देश की धरती को तंत्र-मन्त्र-यंत्र, नृत्य, शास्त्रीय संगीत (विशेषकर तानसेन के दीपक राग, वर्षा राग) योग, ध्यान, परालौकिकता, पुनर्जन्म, टेलीपैथी, दुर्लभ आयुर्वेदिक जडी बूटियाँ (छुई-मुई, संजीवनी बूटी, घ्रित्कुमारी, सर्पगंधा, अश्वगंधा आदि) एक्यूप्रेशर, एक्यूपंचर, पारस, पुष्पक विमान के लिए जाना जाता है. यह रामायण, तुलसी, बाल्मीकि, मर्यादा पुरुषोत्तम राम,लक्ष्मण, कैकेयी, हनुमान, जामवंत,नल-नील, माँ सीता, अहिल्या,अनुसुइया, शबरी के साथ- साथ श्रीकृष्ण,सुदामा, महाभारत, गीता, कुरुक्षेत्र, अर्जुन, भीष्मपितामह, युधिष्ठिर, अर्जुन, कर्ण, अभिमन्यू और उसके चक्रव्यूह तथा यशोदा, गईया, गोवर्धन, कालिया नाग मर्दन के लिए भी जाना जाता है. यह बुद्ध, महावीर जैन और गुरु नानक- गुरु गोविन्द सिंह की धरती रही है. इस देश में प्रकृति की पूजा होती रही है. क्षिति जल पावक पवन समीरा… के सिद्धांत में हमारी आस्था रही है. जल, वायु, अग्नि, पर्वत, नदी, कुआं, वनस्पति एवं पशु पक्षी, कीट की भी पूजा का प्रावधान रहा है. इस पूजन में शंख, तुलसी, गंगाजल, गौमूत्र, गौदुग्ध, विशुद्ध गौघृत के माध्यम से वैदिक मंत्रों के माध्यम से शास्त्रानुकूल पद्धति विकसित की जो कहीं नहीं है. इस पूजन में हर वर्ण का योगदान यथा कुम्हार का बर्तन, डोम द्वारा बांस से निर्मित उत्पाद एवं नाई द्वारा नाखून /बाल काटकर शुद्धिकरण एवं वेश्याओं के यहाँ की मिट्टी के इस्तेमाल के बिना कोई भी मांगलिक कार्य अधूरा माना जाता है. हमारे तीज त्यौहार-व्रत दिन–रात्रि, पंचांग कृषि, जलवायु एवं परम्पराओं पर आधारित है. छठ, चौठचन्द्र, जीवित पुत्रिका, अन्नकूट, वट सावित्री , होलिका दहन, नवरात्रिपूजन , कन्या पूजन आदि इसके उदहारण हैं. यहाँ तपस्या,अश्वमेघ यग्य, भैरव पूजा, नागपंचमी, मद्भागवत पाठ, पुराणों एवं वेदों की ऋचाओं, किन्नर, यक्ष, नगरदेवता, ग्रामदेवता, कुलदेवता तथा अग्निहोत्र/ हवन कुंड एवं हवन पद्धतियों के लिए भी विख्यात है. शंकराचार्य एवं मंडान मिश्र के शास्त्रार्थ, स्वयंवर पद्धति, आदिवासियों में प्रचलित उपासना एवं उपचार पद्धति को कौन नहीं जानता है? यहाँ हर धर्म सम्प्रदाय , पंथ के लिए एक ही न्याय प्रक्रिया है तथा सबों को समदर्शी रूप से देखा एवं आँका जाता है, इसीलिए इसे विविधताओं में एकता का देश भी कहा जाता है. यहाँ के संतों, ऋषियों , मुनियों की जिह्वा पर साक्षात सरस्वती विराजती रही है. यहाँ तुलसीदस , सूरदास , कबीरदास एवं रहीम, चैतन्य महाप्रभु द्वारा ईश्वर की महिमा लोक कंठ में विद्यमान हैं. यहाँ परमहंस –विवेकानंद, द्रोणाचार्य-अर्जुन,विश्वामित्र-राम, चाणक्य- चन्द्रगुप्त आदि जैसे गुरु शिष्य की जोड़ी का गौरव भी रहा है. गीता ने तो धर्म की व्याख्या ही कर दी है …यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर भवत भारत.. अभ्युत्थानं तधर्मस्य … कर्मण्ये वाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन…..
बुद्ध के पंचशील के सिद्धांत तो आज भी प्रासंगिक हैं. हमारी तमाम जीवन पद्धतियाँ , विधियाँ, संस्कार, परंपरा संतुलन का प्रतीक रहा है जो समग्रता या समावेशी होने का परिचायक है.
क्या होना चाहिए?: वैदिक गणित, पंचांग, नक्षत्र विज्ञान, ज्योतिष/ हस्तरेखा विज्ञान , वेदों एवं पुराणों के श्लोकों एवं सूत्रवाक्य ,
मूर्तिकला, शिल्पकला, वास्तुकला ,पांडुलिपियों जैसी विलुप्त चीजों का संरक्षण एवं संवर्धन किया जाना चाहिए. प्राचीन भारत में नालंदा एवं तक्षशिला जैसे विश्वविद्यालयों की गरिमा लौटने के लिए एकजुट होकर कई स्तर पर सामूहिक प्रयास करने की आवश्यकता है.
इस पवन भूमि पर अनेक सकारात्मक एवं वैचारिक शक्तिपुन्जों ने जन्म लिया है. महात्मा गाँधी, सुभाष चन्द्र बोस, भगतसिंह, चंद्रशेखर आजाद, राजगुरु, खुद्दीराम बोस, स्वामी दयानंद, भीमराव आंबेडकर, पंडित मदन मोहन मालवीय, लाल बहादुर शास्त्री, राम मनोहर लोहिया और जयप्रकाश नारायण जैसे साधकों, चिन्तकों एवं आंदोलनकर्मियों ने इस देश का नेतृत्व किया है.
प्राचीन भारत की हमारी तमाम जीवन पद्धतियाँ , विधियाँ एवं संस्कार , परंपरा संतुलन का प्रतीक था. और समावेशी या समग्र था जो आज नहीं है. उस समय वास्तव में प्रकृति का संरक्षण किया जाता था, उसकी पूजा होती थी परन्तु आज हम प्रकृति का दोहन नहीं बल्कि शोषण कर रहे हैं, जो कदापि उचित नहीं है.
हमारी संस्कृति संकीर्णता की नहीं बल्कि व्यापकता की रही है. वसुधैव कुटुम्बकम, अतिथि सत्कार एवं निर्बलों को संबल देना, याचकों को भिक्षा, शरणार्थियों को शरण देना एवं दुश्मनों से उसकी प्राण रक्षा हमारी संस्कृति रही है. चक्रवाती सम्राट दिलीप का गोरक्षा एवं दधिची का देहदान , महाराणा प्रताप एवं शिवाजी का त्याग और सूझ -बूझ आज भी प्रासंगिक है. हमारे देश के वैभव एवं पराक्रम का गूँज समस्त विश्व में विद्यमान रहा है.
लोक संस्कृति एवं पौराणिक गाथाओं के आधार पर भारत के 52 शक्तिपीठों के स्थान से देश में क्रांतिकारी परिवर्तन वाली योजनाओं, परियोजनाओं, प्रकल्पों की आधारशिला बनाने की आज आवश्यकता है. आज आवश्यकता इस बात की है कि मंदिरों , मठों, धर्मशालाओं, ट्रस्टों को सामाजिक सरोकारों का बहुआयामी प्रकल्प बनाया जाय तभी वास्तव में मल्टी डायमेंशनल चेंज संभव हो सकेगा.
क्रियाशील सफल व्यक्तियों को हर स्तर पर प्रोत्साहित किया जाना चाहिए. इस हेतु ROLE MODELS BREED DEVELOPMENT & DATABANK का निर्माण होना चाहिए. अबोर्शन की जगह सही संतति निर्माण की कला विक्सित करनी होगी. बोल्ड चाईल्ड की आकांशा पूर्ती के लिए हमें अपना बहुमूल्य समय भी न्योच्छावर करना पड़ेगा. गर्भज्ञान द्वारा अपेक्षित दिव्य बालक (DIVINE BOY) उदाहरणार्थ अभिमन्यु प्राप्त किया जा सकता है.
योग , आयुर्वेद, वैदिक पद्धति जैसी सांस्कृतिक विरासत के प्रति हम अभी भी पूर्ण रूपें जागरूक नहीं हो पाए हैं, जिसका मुख्य कारण अशिक्षा रही है. विदेशों में इन सरे विषयों को लेकर कई शोध हो रहे हैं. हम अपने विरासत को लेकर जागरूक नहीं हैं और विदेशी हमारी विरासत एवं धरोहरों में आज आशा की नई किरण देखते हैं.
मौलिक प्रश्न यह है कि अब क्या किया जाना चाहिए? वास्तव में हमारे देश की जनता आज भी गुलामीन की जंजीरों से मुक्त नहीं हो पाई है. यह जंजीर लोहे की नहीं बल्कि आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक, मानसिक, भाषायी एवं प्रांतवाद, जातिवाद के रूप में है. कभी -कभी मेरा मन कहता है कि—- ” गुलामों को उसकी गुलामी का अहसास करा दो क्रांति शुरू हो जाएगी.”
गति कैसे आए ? : आज कई स्तरों पर सामानांतर कार्यक्रमों एवं प्रयोगों की नितांत आवश्यकता है. जिस हेतु तकनीक ( TECHNOLOGY TECHNIC ENHANCEMENT ) की मदद ली जा सकती है. समाज में व्याप्त अविश्वास के माहौल का इससे त्वरित समाधान हो सकता है.
भटकाव को कैसे रोकें? : युवाओं का आतंकवादी गतिविधियों के साथ जुड़ना आज हमें गहन चिंतन के लिए मजबूर कर रहा है. बेकारी, बेरोजगारी, अशिक्षा , गरीबी को न्यूनतम कैसे किया जाय , इसपर सामूहिक विमर्श होना चाहिए. भय, भूख और भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के उपाय हमें सोचने होंगे.
कई दुर्लभ एवं अति महवपूर्ण प्रश्न : कृषि प्रधान देश की प्रासंगिकता का प्रश्न , भारत का स्वर्णिम काल, अधिकार और कर्तव्य, समस्या और समाधान, दुर्लभ बीज-वनस्पति-विचार-संस्कृति पर विक्सित देशों का पेटेंट जाल, विश्व बैंक- सुरक्षा परिषद् – WTO – WHO द्वारा पुनः गुलाम बनाने हेतु शर्तों पर आधारित कठोर समझौते, पुरस्कारों का मायावी जाल उदाहरणार्थ : नोबेल पुरस्कार, मैग्सेसे पुरस्कार को हमें आज बारीकी से समझने एवं समझाने की आवश्यकता है. गुरु दधिची, वशिष्ठ, द्रोणाचार्य, विश्वामित्र, परशुराम, यग्यवल्यक एवं गुरुनानक द्वारा दिए गए ज्ञान के आधार पर इसे समझा जा सकता है.
प्रकृति को दोहन नहीं बल्कि हो रहा है शोषण : जहर बनानेवाली बहुराष्ट्रीय कंपनी द्वारा हुए भोपाल गैस काण्ड, उत्तराखंड में आए भयंकर आपदा का मूल कारण रहे जल विद्युत् परियोजनाएँ, वाराणसी में कोकाकोला द्वारा किए जा रहे भयंकर भूजल दोहन इसके चाँद उदहारण हैं.
क्या नाम बदलने से समाधान होगा? : नई बोतल में पुरानी शराब रख देने से कोई बदलाव नहीं होगा. रीपैकेजिंग से वाहवाही बटोरी जा सकती है परन्तु यह स्थाई समाधान का हल नहीं है. आज जनता हर सरकार (केंद्र एवं राज्य) की उपलब्धियों का ब्यौरा पाना चाहती है एवं उसकी मॉनीटरिंग चाहती है. आज सोशल ऑडिट की अत्यत आवश्यकता है. जनता को जानने का हक़ है और उसे उसके हक़ से कोई वंचित नहीं कर सकता है. वास्तव में लोकतंत्र की असली परिभाषा “जनता का, जनता के लिए, जनता द्वारा ” की तभी सार्थकता होगी. आज प्रायः हर सरकार द्वारा चुनाव संपन्न हो जाने के बाद शासन –प्रशासन में जनता की भूमिका को नगण्य कर दिया जाता है. कितनी अजीब बात है कि जिसे हमने अपनी वोट की शक्ति से चुन कर सरकार बनाने की भूमिका निभाई है, वहां हमारी कोई पूछ भी नहीं.प्रजातंत्र के नाम पर वास्तव में मथारण ही हो रहा है, जिसे आज रोका जाना चाहिए. आज सरकार से जनता पूछ रही है कि—” क्या –क्या किया है आपने, आपने क्या –क्या नहीं किया ” ?
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लेखक गोपाल प्रसाद दिल्ली स्थित सूचना अधिकार कार्यकर्त्ता और स्वतंत्र लेखक हैं तथा राष्ट्रीय स्वाभिमान आन्दोलन में आरटीआई प्रकोष्ठ के संयोजक हैं. इनसे मोबाईल नंबर : 9910341785, ईमेल: sampoornkranti@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.

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