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महिला और बाल विकास विभाग, ने इंटरनेशनल डे अगेंस्ट ड्रग अब्यूज पर वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग का आयोजन किया

महिला और बाल विकास विभाग, ने इंटरनेशनल डे अगेंस्ट ड्रग अब्यूज पर वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग का आयोजन किया

26 जून 2020 को महिला एवं बाल विकास विभाग ने निषेध निदेशालय के साथ मिलकर अंतरराष्ट्रीय नशा निरोधक दिवस मनाया। विभाग ने वीडिओ कॉन्फ्रेंसिंग के ज़रिए नशा मुक्ति के बारे में चर्चा की। चर्चा का विषय रहा, कोविड-19 महामारी में पदार्थ के उपयोग के विकारों के लिए चुनौतियां, जिसमें महिला एवं बाल विकास विभाग सचिव सहित कई संस्थाओ और स्टेक होल्डर्स ने हिस्सा लिया।

1. इन्स्टिट्यूट ऑफ़ ह्यूमन बिहेव्यर एंड ऐलायड साइंसेज (IHBAS)
2. दिल्ली स्टेट लीगल सर्विस अथॉरिटी (DSLSA)
3. आल इंडिया इन्स्टिटूट ऑफ मेडिकल साइयन्स (AIIMS)
4. दिल्ली स्टेट एड्ज़ कंट्रोल सोसायटी
5. इंटेग्रेटेड रीहैबिलिटेशन सेंटर फॉर ऐडिक्ट्स
6. सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय
7. नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो
8. चिकित्सा प्रभारी, नशामुक्ति और डिमांड रिडक्शन सेंटर , सुल्तानपुरी.

कैबिनेट मंत्री, राजेंद्र पाल गौतम ने इस मीटिंग के शुरुआत में ड्रग्स दुरुपयोग के मामलों को बारीकी से जाँचने की आवश्यकता को सामने रखा और कहा यदि इसे जड़ से मिटाना है तो सभी संस्थाओ को साथ मिलकर काम करना होगा। उन्होंने बच्चों और युवाओं के बीच नशीली दवाओं के दुरुपयोग के बढ़ते कारणों को देखने पर भी जोर दिया,जो पुनर्सुधार केंद्रों में परामर्शदाताओं द्वारा किया जा सकता है।

“एक गंभीर मुद्दा जो हमारे समाज को प्रभावित करता है वह है नशीली दवाओं के दुरुपयोग की समस्या, खासकर बच्चों और युवाओं में। वे बहुत कम उम्र में, नशे की गिरफ्त में आ जाते हैं क्योंकि उनके पास ड्रग्स और मादक पदार्थों की उपलब्धता बेहद आसानी से हो जाती है। अपराध की दृष्टि से, यह वास्तव में एक गंभीर मुद्दा है – हमें यह जानना होगा इसकी, आपूर्ति कौन कर रहा है? लेकिन सबसे ज़रूरी ये जानना है कि इन नशीले पदार्थों की मांग इतनी अधिक क्यों बढ़ रही है? इतनी कम उम्र में युवा वयस्क मादक पदार्थों की गिरफ्त में क्यूं फंस रहे हैं? हमें यह देखना होगा कि कैसे हम इन युवाओं और बच्चों को बेहतर काउंसलिंग दे सकते हैं और सफलतापूर्वक पुनर्वास कर सकते हैं? “- राजेंद्र पाल गौतम

राजेंद्र पाल गौतम ने सभी विभागों, संस्थानों और स्टेकहोल्डर्स को नशीली दवाओं के दुरुपयोग की समस्या को हल करने के लिए एक दूसरे के साथ समन्वय में काम करने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि ड्रग रिहैबिलिटेशन सेंटरों को सक्रिय रूप से सर्वेक्षण करना चाहिए ताकि यह पता लगाया जा सके कि उनके केंद्रों में कितने लोगों का सफलतापूर्वक पुनर्वास किया गया था। इसे गुणात्मक रूप से मापा जाना चाहिए अर्थात् यदि पुनर्वास केंद्र से किसी व्यक्ति को छुट्टी दे दी गई थी, तो वह वापस तो यहां नहीं आया या वापस नशे की गिरफ्त में आया हो। यह पुनर्वास केंद्रों में दी गई काउंसलिंग और देखभाल की प्रभावशीलता को मापने में मदद कर सकता है।

सभी प्रतिभागियों ने महिला और बाल विकास विभाग की, कोरोना महामारी के दौरान की गई इस पहल का स्वागत किया और नियमित आधार पर इन जागरूकता कार्यक्रमों का संचालन करने पर जोर दिया। इस तरह के कार्यक्रमों में युवाओं को शामिल करने के लिए बढ़ावा दिया जाना चाहिए, ताकि बेहतर परिणाम मिल सके।

एस.बी. शशांक, निदेशक निषेध निदेशालय, ने प्रसिद्ध टीवी धारावाहिक ‘अंधी गलियां’ के बारे में उल्लेख किया जो 1985 में, मादक पदार्थों की समस्या पर दूरदर्शन पर प्रसारित किया गया था। उन्होंने कहा, इलेक्ट्रोनिक मीडिया के ज़रिए इसी तरह की जागरूकता और संवेदनशीलता की आवश्यकता है।

“साल में सिर्फ एक बार जागरूकता कार्यक्रम करने से, हमारे समाज में नशेखोरी की समस्या से निजात नहीं मिल पाएगी। हमें समन्वय में काम करने की और उन सभी अंतर्निहित कारणों पर भी गहन शोध करने की आवश्यकता है जो मादक पदार्थों के सेवन की समस्या को बढ़ाते और उकसाते हैं। इस शोध के बाद ही, हम कोई ठोस नीति बना पाएंगे, जो इस समस्या को प्रभावी और कठोर तरीके से निजात दिला सकेगी – राजेंद्र पाल गौतम

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