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रोहिणी की जनता करती रही इन्तजार… लेकिन नहीं पहुँचे मंत्री महोदय। चुनाव से पहले थे आम… अब हो गए ख़ास!

रोहिणी की जनता करती रही इन्तजार… लेकिन नहीं पहुँचे मंत्री महोदय। चुनाव से पहले थे आम… अब हो गए ख़ास!

जी हाँ ये कहना है रोहिणी के सोसाइटीयों में राहने वाली आम जनता का जो शनीवार देर रात तक दिल्ली के उपमुख्यमंत्री की प्रतीक्षा में पलके बिछाए बैठी रही लेकिन मंत्री महोदय आखिरकार नहीं पहुँचे और सैकड़ों आम आदमियों को घंटों इन्तजार करने के बाद बैरंग घर लौटना पड़ा।
दरअसल रोहिणी के सोसाइटीयों को विकास कार्यों के लिये विधायक निधी से वित्तीय सहायता की मंजूरी देने के लिये फेडरेशन ऑफ़ रोहिणी कोआपरेटिव ग्रुप हाउसिंग सोसाइटीज ने अपने रजत जयंती समारोह के अवसर पर सरकार के लिए धन्यवाद कार्यक्रम का आयोजन किया था। उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया इस कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि शिरकत करने वाले थे और उनके आने का समय आठ बजे निर्धारित था। लेकिन जब दस बजे तक भी मंत्री जी नहीं पहुँचे तो सभागार में उपस्थित सभी आम आदमी मंत्री महोदय क्र लेट लतीफ़ी से ऊब कर भोजन की तरफ रुख किया और ज्यादातर लोग ग्यारह बजे तक समारोह स्थल से चलते बने।
हालाँकि दस बजे तक भी मंच से यही सूचना आती रही की मुख्य अतिथि बस दस मिनट में पहुँचने ही वाले हैं…. लेकिन कई दस मिनट बीत जाने के बाद भी आम आदमी के मसीहा कहे जाने वाली केजरीवाल सरकार के मंत्री सिसोदिया जी नहीं पहुँचे।
लिहाजा शिकायत भरे शब्द लोगों ने बात चीत से शुरू की और उसके बाद मुखर हो कर अपनी कुंठा निकालनी शुरू कर दी। एक स्थानीय बुजुर्ग जो की चार घंटे से कोने की कुर्सी पकड़े बैठे थे… हताशा में कहते नज़र आये, “काहे का आम आदमी और काहे का जनता का मंत्री… आज कल सब खास हो चले हैं। नहीं आना था तो पहले बता देते… इतना इन्तजार क्यों करवाया? अब उनका कोई नुमाइंदा आ कर मंच पर दाँत निपोर कर बोल देगा की मंत्री जी किसी आवश्यक कार्य में व्यस्त थे या अकस्मात् कुछ काम आ गया”।
खैर! मंत्रियों का लेट आना … या फिर ना आने के बाद इस तरह के बहाने तो मुहावरे की तरह हैं। जब जरूरत पड़े चिपका दो। लेकिन पूरी तैयारी और लाल कारपेट बिछा कर उपमुख्यमंत्री की प्रतीक्षा कर रहे फेडरेशन के अधिकारीगण भी अपनी घोर निराशा को कृत्रिम मुस्कान के पीछे छुपाते नज़र आए। “कोई नहीं… ये सब तो चलता है.. बड़े लोग हैं, फँस गए होंगे कहीं”!!
और भी गणमान्य अतिथि आमंत्रित थे समारोह के लिए जैसे की श्री विजेंद्र गुप्ता (दीप प्रज्वलन के लिये), श्री महेंद्र गोयल (बतौर अति विशिष्ट अतिथि) इत्यादि इत्यादि।
आज कल ‘अति विशिष्ट’, विशिष्ट, विशेष और सामान्य का प्रचलन जोरों पर है। आम जनता सोचती थी ये प्रचलन मार्च 2015 के बाद ख़त्म हो जायेगा लेकिन वास्तविकता सामने है।
सब कुछ झोल झाल टाइप दिख रहा है… नज़रों का धोखा कहें क्या सियासत का खेल समझ नहीं आ रहा ।

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