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वह दिन दूर नहीं, जब सड़कों पर ठहर जाएगी दिल्ली

वह दिन दूर नहीं, जब सड़कों पर ठहर जाएगी दिल्ली

दिल्ली की सड़कों पर जाम लगना आम बात है। आइटीओ हो या विकास मार्ग, साउथ एक्स. हो या एम्स, राष्ट्रीय राजमार्ग 24 से लेकर गुड़गांव एक्सप्रेस-वे, पूसा रोड से लेकर चांदनी चौक तक। सुबह हो या शाम, जाम में दिल्ली वालों का महत्वपूर्ण समय बर्बाद हो रहा है। लेकिन ऐसा लगता है कि विकराल होती इस समस्या का निदान ढूंढने में सरकारी एजेंसियां हाफने लगी हैं। कहा जा सकता है कि वह दिन ज्यादा दूर नहीं जब दिल्ली सड़कों पर ही ठहर जाए। पेश है छठी किस्त:
कई जगहों पर महज 10 मिनट के सफर में घंटेभर का समय लग रहा है। जाम में फंसी हजारों गाड़ियों के कारण ईधन की भी बर्बादी हो रही है। साथ ही इससे वातावरण भी प्रदूषित हो रहा है। यह जाम लोगों को शारीरिक और मानसिक तौर पर बीमार भी बना रहा है। बस में सवार मध्यम व निम्न वर्ग का यात्री हो या लंबी कार में बैठा उद्योगपति, जाम ने सबका सुकून छीन लिया है। जाम के कारण रोड रेज की घटनाएं भी लगातार बढ़ रही हैं। जाम से मुक्ति दिलाने के नाम पर सरकार सड़कों का जाल बिछा रही है। फ्लाईओवरों और फुट ओवरब्रिज की संख्या भी बढ़ती जा रही है।
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सरकार का जोर वाहन बढ़ाने पर
सरकार की नीति से दिल्ली की सड़कों पर जाम की समस्या बढ़ रही है। सरकार सोचती है कि सड़कों, ओवरब्रिज का विस्तार और नए पार्किंग स्थल बनाने से जाम की समस्या से मुक्ति मिलेगी लेकिन ऐसा नहीं है। लोगों के पास निजी वाहन बढ़ते जा रहे हैं। दिल्ली के भौगोलिक क्षेत्र का करीब 21 फीसद हिस्सा सड़कों के हवाले हो गया है। जबकि मुंबई में यह 12 फीसद है और कोलकाता में केवल 6 फीसद। इसी प्रकार दिल्ली में जगह की कीमत की तुलना में पार्किंग की दर काफी कम है। अधिकतर पार्किंग स्थल तो फ्री ही हैं। ऐसे में लोग निजी वाहन खरीदने की तरफ आकर्षित हो रहे हैं। दिल्ली की सड़कों का 75 फीसद हिस्सा अकेले कारें घेरे हुई हैं। लेकिन यह यात्रियों के बोझ का मात्र 14 से 15 फीसद ही उठाती हैं। एक बस में जहां 60 व्यक्ति आ सकते हैं, वहीं एक कार में एक ही व्यक्ति सफर कर रहा है। चितरंजन पार्क जैसे इलाके के 30 फीसद हिस्से पर ये निजी वाहन कब्जा किए हुए हैं। यातायात व्यवस्था को सुदृढ़ बनाने की दिशा में आवंटित मद का 80 फीसद हिस्सा आधारभूत ढांचे के निर्माण में ही खर्च हो जाता है।
-अनुमिता राय चौधरी, कार्यकारी निदेशक, सेंटर फार साइंस एंड इन्वायरन्मेंट
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आसानी से बन जाता है ड्राइविंग लाइसेंस
‘राष्ट्रीय राजधानी में ड्राइविंग लाइसेंस आसानी से बन जाते हैं। ऐसे ड्राइवरों की संख्या हजारों में है, जिन्हें यातायात नियमों की सही जानकारी नहीं है। उन्हें पता नहीं है कि सड़क पर चलने के लिए उनके वाहन के लिए निर्धारित लेन क्या है। वाहनों की क्या स्पीड लिमिट होनी चाहिए। इसी तरह दिल्ली की कई सड़कों पर लेन चिह्न स्पष्ट नहीं है, या हैं ही नहीं। इस कारण वाहन सड़क पर दायें-बायें भागते हैं और इससे जाम की समस्या बढ़ जाती है। दिल्ली की सड़कों पर हर प्रकार के वाहनों को चलने की अनुमति है। किसी वाहन की रफ्तार ज्यादा है तो किसी की मानक से काफी कम। ऐसे में धीमी रफ्तार के ऑटो, हाथ रिक्शा, टैंपो सड़क पर यातायात को धीमा करते हैं। प्रतिबंध के बावजूद कई सड़कों, यहां तक कि राजमार्ग पर भी पर ऑटोरिक्शा और हाथरिक्शा फर्राटे भर रहे हैं और इन्हें सख्ती से रोकने का कोई तंत्र मौजूद नहीं है। जाम का कारण बड़ी संख्या में सड़कों पर दौड़ रहे निजी वाहन भी हैं। लेकिन बेहतर सार्वजनिक यातायात व्यवस्था मौजूद नहीं है, जिसे देखकर लोग निजी वाहन छोड़ने को उत्सुक हों। सड़कों में जगह-जगह गड्ढे व जलभराव भी जाम की समस्या को बढ़ाते हैं।
-केके कपिला, अध्यक्ष, अंतरराष्ट्रीय रोड फेडरेशन
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ट्रैफिक लाइट सिस्टम ठीक नहीं
‘दिल्ली में ट्रैफिक लाइट सिस्टम ठीक से काम नहीं करता है। अक्सर देखने में आता है कि जिस सड़क पर वाहनों का दबाव ज्यादा है, उस पर रेड लाइट की अवधि ज्यादा रहती है। इस कारण सड़क के एक ओर वाहनों का दबाव बढ़ता जाता है, जबकि दूसरे तरफ की सड़क खाली रहती है। काफी संख्या में रेड लाइट भी जाम की समस्या को बढ़ाने का काम करती हैं। अक्षरधाम मंदिर के पास पहले दो रेड लाइट थी, अब एक फुट ओवरब्रिज बनाकर एक रेड लाइट को खत्म किया गया है। फुटओवर ब्रिज कहीं सड़कों पर गलत स्थान पर बने हैं तो कहीं है ही नहीं। इससे पैदल यात्री यहां जान खतरे में डालकर सड़क पार करते हैं। कनॉट प्लेस, मंडी हाउस समेत अनेक स्थानों पर जेब्रा क्रासिंग गोल चक्कर के नजदीक बनाई गई हैं। इससे लोगों को सड़क पार करने में परेशानी होती है। यह भी जाम की समस्या बढ़ाने का कारक है।
-मो. इमरान, संस्थापक, सेफ रोड फाउंडेशन

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