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सरकार और न्यायपालिका की कदमताल

सरकार और न्यायपालिका की कदमताल

यकायक ही न्यायिक सक्रियता पुनः अपने चरम पर है। पिछले तीन बर्षो में मोदी सरकार के न्याय पालिका से रिश्ते कुछ अच्छे नहीं रहे। इसी कारण देश के उच्च न्यायलयों ओर उच्चतम न्यायलयों में न्यायधीशों की नियुक्ति लंबित पड़ी थीं। पिछले कुछ माह में अंदरखाने सरकार और न्यायपालिका में सुलह ओर समझौतों के कुछ दौर चले और अब स्थितियों में बड़े सुधार दिख रहे हैं। देश के प्रमुख संवैधानिक पदों पर भी भाजपा का कब्जा होने, राज्यसभा में प्रमुख दल बनने और जेडीयू एवं अन्ना डीएमके के एनडीए में आने की कवायद के बीच मोदी सरकार बहुत मजबूत स्थिति में पहुंच चुकी है। मोदी सरकार के सभी पमुख पदों पर अपने लोग और सरकार के नीति निर्माण पर अपनी सोच स्थापित करने की स्थिति में आ चुके हैं। ऐसे में संघ और भाजपा के मूल एजेंड को लागू करवा पाने में मोदी सरकार की सक्रियता देखते ही बनती है। एक ओर देश मे सक्रिय आतंकी, नक्सली और वामपंथी गढ़ तोड़े जा रहे हैं वहीं चर्च और इस्लामी कट्टरपंथी तत्त्वों को भी निबटाया जा रहा है। इसी के साथ देश के अधिकतम राज्यों में अपनी सरकारे बनबाने के लिए चुनावों के साथ ही गठजोड़ ओर तोड़फोड़ का सहारा भी लिया जा रहा है। परिणामस्वरूप देश के तीन चौथाई राज्यों पर एनडीए कब्जा जमा चुका है। ऐसे में संविधान में संघ परिवार के एजेंडे के अनुरूप बड़े संवैधानिक बदलाबो की श्रृंखला संसद के शीतकालीन सत्र से शुरू होने जा रही है। बड़ी चतुरता से मोदी सरकार ने अपने एजेंडे के अनेक विवादास्पद मुद्दों न्यायपालिका के मत्थे मड़ दिया है। सरकार जानती है कि कांग्रेस की पिछली सरकारों ने जानबूझकर इन मुद्दों को सुलझने नहीं दिया और न ही न्यायालय से शीघ्र सुनवाई की मांग की और न ही अनेक मुद्दों पर कानूनी स्थिति को स्पष्ट करवाया गया। निश्चित रूप से यह अपने छिपे एजेंडे ओर वोट बैंक को खुश रखने की खातिर किया गया था। तीन तलाक की कानूनी स्थिति और समान नागरिक संहिता, आधार कार्ड और निजता का अधिकार,कश्मीर में धारा 370 को उपधारा 35 A की वास्तविक स्थिति, अयोध्या के राम जन्मभूमि विवाद पर न्यायिक स्पष्टता, साध्वी प्रज्ञा, कर्नल पुरोहित, आई जी बंजारा, राम रहीम संबंधी लंबे लटकते आपराधिक मामले इन सब पर पिछले कुछ ही समय में न्यायिक निर्णयों की जो झड़ी लगी वो अकस्मात नही हो सकता। बिना सरकार की रुचि और कोशिशों के इतने सारे मुद्दे अकेले न्यायपालिका सिरे नहीं चढ़ा सकती। निश्चित रूप से मोदी सरकार को विश्वास था कि अगर निष्पक्ष रूप से इन मुद्दों पर न्यायपालिका निर्णय दे तो परिणाम उनके ओर उनकी पार्टी के इन मुद्दों पर अपनाए गए रुख के अनुरूप होंगें। औऱ ऐसा ही कुछ हो भी रहा है। तीन तलाक मुस्लिम महिलाओं के लिए अभिशाप है और उच्चतम न्यायालय ने इसे असंवैधानिक घोषित कर दिया है। सन 1986 के शाहबानो मसले पर पलटी खाई कांग्रेस सरकार के कारण देश मे मुस्लिम कट्टरपंथ की जो हव चली उससे समान नागरिक संहिता को स्थापित करने के संवैधानिक उत्तरदायित्व से सरकार कोसों दूर चली गयी थी, अब पुनः इस दिशा में तीव गति से कदम उठने संभव हो पाएंगे। निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार घोषित करना एक क्रांतिकारी फैसला है। देश के तीव्र डिजिटलीकरण के बीच निजता ओर आई टी क्षेत्र के कानूनी पक्षों पर स्पष्टता की बहुत समय से मांग उठ रही थी। अब आधार कार्ड के डाटा की गोपनीयता, सरकार और निजी क्षेत्र के पास जनता की निजी जानकारियों की सुरक्षा, देश मे काम कर रहे विदेशी सर्वरों को देश मे ही सर्वर स्थापित करने की विवशता देश और जनता के हित मे ही है। अगले कुछ समय में इस मुद्दे से संबंधित अनेक औऱ उलझे बिंदुओं की कानूनी स्थिति स्पष्ट होती जाएगी। अयोध्या मसाला भी अब 5 दिसंबर से नियमित सुनवाई पर आ जायेगा और राम मंदिर के निमार्ण का रास्ता भी इसी के साथ प्रशस्त हो जाएगा। धारा 370 की उपधारा 35A की वैधता भी अब उच्चतम न्यायालय में विचाराधीन है, जिसके कारण शेष देश के लोग कश्मीर में जमीन नहीं खरीद पाते और इसी कारण इस प्रदेश में अलगाव भीषण रूप में घर करता गया। उम्मीद है न्यायलय इस उपधारा को अवैध घोषित कर कश्मीर को देश की मुख्यधारा से जोड़ने के मोदी सरकार के अभियान को आगे बढ़ाने में मदद करेगा।
हिन्दू आतंकवाद के फर्जी आरोप में बर्षो से जेल में पड़े पुलिस अधिकारी बंजारा,कर्नल पुरोहित ओर साध्वी प्रज्ञा की रिहाई बहुसंख्यक उदारवादी हिन्दू समाज पर लगे झूठे कलंक के धुलने के समान है। इसी प्रकार हिंदू धर्म और वैदिक संस्कृति के विरुद्ध खड़े किए गए सेकड़ो मतों, डेरो ओर बाबाओं को भी निबटाया जा रहा है जो अत्यंत आवश्यक है। राम रहीम जैसे बलात्कारी को मिली सजा देश मे इन फर्जी बाबाओ के करोड़ों अंधभक्तों के लिए एक बड़ा सबक है। यद्धपि जिस प्रकार की हिंसा इस पूरे प्रकरण में हुई अगर सरकार और न्यायधीश थोड़ी ओर सावधानी से काम लेते तो उससे बचा जा सकता था।

Anuj Agrawal, Editor
Dialogue India ( Career Magazine)

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