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हर तरह से नुकसानदेह हैं पटाखे: सामाजिक परिपेक्ष्य का विचार

हर तरह से नुकसानदेह हैं पटाखे: सामाजिक परिपेक्ष्य का विचार

दीपावली पर पटाखों पर रोक थी। देखने में आया और ज्ञात भी हुआ कि कुछ जगहों पर पटाखे लगभग बंद से ही थे। कुछ स्थानों पर सारी रात धड़ाधड़ बम-पटाखे चले। रोक होने के बाद पटाखे कहां से आये, कैसे बिके, कैसे खरीद हुई, यह सोचनीय बिंदु है। एक रटी-रटाई विचारधारा से हट कर बात करें, तो कहीं यह प्रमाणित, उल्लेखित नहीं है कि, दीपावली बम पटाखों से ही मनती है। रामचंद्र जी के वनवास से वापस लौटने पर अयोध्या को दीप मालाओं से सजाया गया था। उसी का अनुसरण करके रोशनी, दीप रोशन करके मनाई जाती है। समय अनुसार पीढियों के किये हुए परिवर्तन हैं, जो आधुनिकता के साथ-साथ हम सबने स्वीकार कर लिये। अब यह बम पटाखों के प्रचलन को वर्षों तक रहने के फलस्वरूप “जैसा सुना वैसा माना” वाले लोगों ने सीधा धार्मिक परंपरा व भावना का नाम दे दिया। भगवान राम के बनवास से लौटने के समय बम पटाखे छोड़ने का कोई शास्त्रीय उल्लेख भी नहीं है। ऐसे में महज कल्पित धार्मिक भावना में बह कर बम पटाखे छोड़ कर ही दिपावली को सार्थक मानना, भ्रम और दिखावा है।
सरकार किसी भी विषय पर विशेष कर जिसे लोक प्रचलन में धार्मिक कर्मों, पर्वों, उत्सव त्योहारों से जोड़ा हुआ है, बिना सोचे समझे रोक नहीं लगाती। अपने-अपने ज्ञान के अनुसार लोग समझ लेते हैं कि, धार्मिक भावनाओं को आहत किया है। उसके पीछे कोई बड़ा कारण होता है, उसे नहीं देखते! ऐसा नहीं है, कि बिना विचारे ही रोक लगा दी गई हो! ऎसे ज्वलंत विषयों पर बहुत गहन मंथन करके, उसमें जो सर्वहिताय मार्ग हो, वह नीति सरकार द्वारा लागू की जाती है। ज्ञात होना चाहिए कि राजस्थान के सर्वोच्च चिकित्सा संस्थान एस एम एस के मेडिसिन विभाग के विभागाध्यक्ष और आचार्यों की समिति द्वारा सितंबर माह में ही प्रधानाचार्य एस एम एस मेडिकल कॉलेज को पत्र लिखा गया था कि, कोरोना वायरस संक्रमण के चलते बम पटाखों के धुएँ के प्रभाव से गंभीर प्रकृति के मरीजों को हानि होना संभावित है। वायु प्रदूषण और वायुमंडल में आक्सीजन के अनुपात में कमी फेफड़ों के लिए हानिकारक है और फेफड़ों से संबंधित कोई बीमारी हो, फेफड़े कमजोर हों, दमा अस्थमा के रोगी हों, उनके लिए तो बहुत खतरनाक हो सकता है। इसलिए दीपावली पर पटाखों पर रोक लगाने की आवश्यकता थी।
इधर, कोरोना वायरस के रोगी तो सभी जगह है। ऎसे में इस संकट काल में पूरे प्रदेश में पटाखों पर रोक लगाना जन स्वास्थ्य के मध्य नजर अच्छा कदम है। इसे नकारात्मक रूप में नहीं देखना चाहिए, अपितु यह सोचना चाहिए कि सरकार ने इतना विचारणीय कदम उठाया है, तो अवश्य जनसामान्य का हित छिपा है। क्यों रोक लगायेगी सरकार बिना वजह के? यह विचार करना चाहिए, और सरकार की नीति को स्वप्रेरणा से भी मानना चाहिए। प्रशासन कहाँ-कहाँ ध्यान रखे? दीपावली पूजन के समय घर-घर पटाखों की निगरानी करता कौन घूमे? और फिर किसी के जुर्माना कर दें तो जुर्म तो छुप जाता है, प्रशासन की सख्ती, तानाशाही और पता नहीं क्या-क्या नजर आने लगता है। सरकार द्वारा दी जा रही सुविधाएं भी याद नहीं आती। और तो और आश्चर्य तो तब हुआ, जब एक शादी के ढुकाव में धड़ाधड़ पटाखे सड़क पर चलाते दिखाई पड़े। विवाह-शादी में हजारों रूपयों के महंगे पटाखे आतिशबाजी पर अनायास ही व्यय कर देते हैं। कोई भूखा यदि पहुंच जाये तो उसे दुत्कार दिया जाता है। इतने लोग जहां भोजन करते हैं, वहां एक जरूरतमंद गरीब को खाना नहीं देते, तब हम कौनसी संस्कृति की पालना कर रहे हैं जो पटाखों की रोक इतनी कष्ट दायी लगे। विचारणीय है, और विचार हमें ही करना पड़ेगा कि हमें दिखावे की, बनाई हुई परंपराएं माननी हैं या संस्कृति के मूल सिद्धांतों की! कानून मर्यादा का दूसरा नाम है, मर्यादा में रहना सीखाता है। श्री राम चन्द्र मर्यादा पुरुषोत्तम थे। मर्यादा पालन करके राम नाम और उनके आदर्शों की स्थापना की जा सकती है, श्री राम के नाम पर मर्यादा तोड़ कर नहीं।

लीलाधर शर्मा
वरिष्ठ आयुर्वेद चिकित्सा अधिकारी
गुसांईसर चूरू

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